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MP Bureaucracy vs Startups: साहब के पास ‘टाइम’ नहीं, स्टार्टअप का ‘दम’ निकला! क्या ऐसे बनेगा आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश?

साहबकी बेरुखी और युवाओं की बर्बादी

भोपाल। मध्य प्रदेश मेंईज ऑफ डूइंग बिजनेस‘ (Ease of Doing Business) के बड़ेबड़े दावे शायद केवल कागजी फाइलों और होर्डिंग्स तक ही सीमित हैं। जमीन पर हकीकत यह है कि प्रदेश का भविष्य कहे जाने वाले छोटे स्टार्टअप्स (Startups) और व्यापारी, सरकारी दफ्तरों की चौखट घिसने को मजबूर हैं।

इंतज़ार की इंतहा: घंटों नहीं, महीनों की दूरी एक तरफ सरकार युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश की टॉप ब्यूरोक्रेसी (Top Bureaucracy) के पास इन छोटे उद्यमियों की बात सुनने तक का समय नहीं है। सूत्रों और पीड़ित व्यापारियों की मानें तो अधिकारियों से मिलने के लिए घंटों इंतजार करना तो अबनॉर्मलबात हो गई है। कई बार तो महीनों तक अपॉइंटमेंट नहीं मिलता और जब मिलता है, तो मदद के बजाय केवल घुमावदार बातें औरअगली बार आनाका झुनझुना थमा दिया जाता है।

समय की बर्बादी या स्टार्टअप की हत्या?

एक स्टार्टअप के लिए समय ही पैसा (Time is Money) होता है। जब एक युवा उद्यमी अपना काम छोड़कर मंत्रालय और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है, तो उसकी पूंजी और हौसला दोनों धीरेधीरे खत्म होने लगते हैं। कई होनहार स्टार्टअप्स तो शुरू होने से पहले ही इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर सही मार्गदर्शन या जरूरी परमिशन नहीं मिल पाती।

मदद की जगहबातों की जलेबी शिकायत यह भी है कि अगर किसी तरह मुलाकात हो भी जाए, तो अधिकारी समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें नियमों के जाल में उलझा देते हैं। छोटे व्यापारियों का आरोप है कि बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए लाल कालीन बिछाने वाले अधिकारी, अपने ही प्रदेश के छोटे व्यापारियों कोबोझसमझते हैं।

क्या यही है विकास का मॉडल? अगर मध्य प्रदेश के होनहार युवाओं को अपने ही राज्य में अफसरशाही की बेरुखी का शिकार होना पड़ेगा, तो वे पलायन करने को मजबूर होंगे। क्या मुख्यमंत्री और संबंधित विभाग इनएसी कमरोंमें बैठे अफसरों की जवाबदेही तय करेंगे? या फिर छोटे स्टार्टअप्स ऐसे ही सिस्टम की भेंट चढ़ते रहेंगे?

gaurav
Author: gaurav

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