
ब्राह्मण चेहरे को हाशिए पर धकेलने की साजिश, क्या खड़गे–राहुल देख पाएंगे ‘अपनों‘ का यह घात
भोपाल | विशेष संवाददाता
मध्य प्रदेश कांग्रेस में अंदरूनी कलह का लावा अब फूट चुका है। खबर है कि युवा और प्रखर ब्राह्मण नेता हेमत कटारे ने उप–नेता प्रतिपक्ष के पद से दूरी बनाने का मन बना लिया है। यह केवल एक इस्तीफा नहीं, बल्कि उस डूबते जहाज की चेतावनी है जिसे कांग्रेस के ही कुछ ‘दिग्गज‘ नेता दीमक की तरह चाट रहे हैं। जिस पार्टी ने दशकों तक सूबे की सियासत पर राज किया, आज वह अपनों की गद्दारी और ‘अपनों‘ को ही खत्म करने की नीति के कारण वेंटिलेटर पर नजर आ रही है।
ब्राह्मणों का अपमान: कांग्रेस के पतन की पटकथा?
मध्य प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समाज हमेशा से किंगमेकर की भूमिका में रहा है। हेमंत कटारे जैसे कद्दावर नेता, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का झंडा थामे रखा, उन्हें दरकिनार करना कांग्रेस की लुटिया डुबोने जैसा है।
सवाल यह है: क्या कांग्रेस को अब ब्राह्मण वोटों की जरूरत नहीं रही?
आरोप: पार्टी के अंदर बैठे कुछ ‘पुराने चावल‘ अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में नए और ऊर्जावान नेतृत्व की बलि चढ़ा रहे हैं।
“जब घर के चिराग ही घर को जलाने लगें, तो दुश्मन की जरूरत नहीं होती। हेमंत कटारे का जाना एमपी कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है।” — राजनैतिक विश्लेषक
दिल्ली दरबार खामोश क्यों? राहुल–खड़गे की चुप्पी पर उठे सवाल
एक तरफ राहुल गांधी ‘न्याय यात्रा‘ निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी नाक के नीचे मध्य प्रदेश में कार्यकर्ताओं के साथ ‘अन्याय‘ हो रहा है। क्या मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी उन चेहरों को पहचान पाएंगे जो दशकों से पार्टी के उच्च पदों पर बैठकर कांग्रेस को भीतर से खोखला कर रहे हैं?
पार्टी के पतन के मुख्य कारण:
● गुटबाजी का दीमक: बड़े नेताओं का अपना ‘वर्चस्व‘ बनाए रखने का मोह।
● जातिगत असंतुलन: ब्राह्मण जैसे मजबूत वोट बैंक के नेताओं को अपमानित करना।
● जमीनी नेताओं की अनदेखी: एसी कमरों में बैठने वाले नेताओं का हावी होना।
भारी पड़ेगा यह ‘झटका‘
हेमंत कटारे का इस्तीफा केवल एक पद का त्याग नहीं है, बल्कि यह उन हजारों कार्यकर्ताओं का मोहभंग है जो पार्टी के लिए सड़कों पर लड़ते हैं। यदि आलाकमान ने तुरंत हस्तक्षेप नहीं किया, तो 2028 तो दूर, कांग्रेस का अस्तित्व ढूंढने से भी नहीं मिलेगा।







