एमपी में ‘मजबूत’ चेहरा या ‘मजबूर’ तंत्र? कर्ज की मलाई और भ्रष्टाचार की विदाई!

विशेष रिपोर्ट: ‘मोहनराज में बेलगाम नौकरशाही और खाली होता खजाना

भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों एक ही सवाल तैर रहा हैसरकार डॉ. मोहन यादव चला रहे हैं या सत्ता की डोर कहीं और से खींची जा रही है? एक तरफ जनता कोदेशभक्तिऔरसांस्कृतिक पुनरुत्थानका पाठ पढ़ाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्टाचार कीलूट एक्सप्रेससरपट दौड़ रही है। आलम यह है कि सूबा कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है और सरकार इवेंट मैनेजमेंट में व्यस्त है।

कर्ज लेकर घी पीने की संस्कृति

मध्य प्रदेश इस वक्त कर्ज लेने की मशीन बन चुका है। हर महीने हजारों करोड़ का नया कर्ज लिया जा रहा है, लेकिन विकास जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।

     आंकड़ों का खेल: प्रदेश पर कर्ज का बोझ 4 लाख करोड़ के पार पहुँचने को है।

     पूँजीपतियों की चांदी: जनता के टैक्स का पैसा विकास कार्यों के बजाय पुरानी देनदारियों और फिजूलखर्ची की भेंट चढ़ रहा है।

     अधिकारी राज: मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि फाइलों पर दस्तखत तो मुख्यमंत्री के होते हैं, लेकिननियमऔरनीतिपर्दे के पीछे बैठे कुछ खास सिपहसालार तय करते हैं।

देशभक्ति का चश्मा औरलूटका चस्का

सरकार का दोहरा चेहरा अब उजागर होने लगा है। एक तरफ राष्ट्रवाद की ऊँची आवाज में जनता को उलझाया जाता है, वहीं दूसरी ओर जिला स्तर से लेकर वल्लभ भवन तक भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण हो चुका है। पटवारी से लेकर कलेक्टर तक, बिनासुविधा शुल्कके फाइलें आगे नहीं बढ़तीं।

बड़ा सवाल: क्या मोहन यादव एककमजोरमुख्यमंत्री साबित हो रहे हैं? जो नौकरशाही पर नकेल कसने में नाकाम हैं या फिर उन्हें जानबूझकरफ्री हैंडनहीं दिया गया है?

जनता त्रस्त, तंत्र मस्त

     महंगाई की मार: आम आदमी बिजली बिल और टैक्स के बोझ तले दबा है।

     बेरोजगारी: युवा सड़कों पर हैं, लेकिन सरकारी विज्ञापनों मेंसब चंगा हैका शोर है।

     अधिकारियों की मनमानी: जनता की सुनने वाला कोई नहीं है। अधिकारी खुद को ही सरकार समझने लगे हैं।

 दिखावे की राजनीति का अंत कब?

मध्य प्रदेश की जनता अब केवलजय श्री महाकालके उद्घोष से संतुष्ट नहीं होने वाली। उसे जवाब चाहिए कि उसका पैसा कहाँ जा रहा है? उसे जवाब चाहिए कि कर्ज की मशीन बनी यह सरकार आने वाली पीढ़ी को क्या सौंप कर जाएगी? अगर डॉ. मोहन यादव अपनी छवि एक स्वतंत्र और कड़क प्रशासक की बनाना चाहते हैं, तो उन्हें पर्दे के पीछे के खिलाड़ियों को किनारे कर सीधे जनता के सरोकारों से जुड़ना होगा। वरना, इतिहास उन्हें केवल एकरबर स्टैंपमुख्यमंत्री के रूप में याद रखेगा।

  • Gaurav Singh

    Gaurav Singh

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