
गरीब और जरूरतमंद परिवारों को अस्पताल या घर से अंतिम संस्कार स्थल तक सम्मानपूर्वक शव पहुँचाने के लिए शुरू की गई ‘निःशुल्क शव वाहन सेवा’ में भारी अनियमितता का मामला सामने आया है। जहाँ सरकार प्रदेश के 55 जिलों में 148 नए शव वाहन शुरू करने का दावा कर रही थी, वहीं एजेंसी ने नियमों को ताक पर रखकर 101 पुराने मॉडल के वाहन मैदान में उतार दिए हैं।
वाहन खरीद और सेवा अनुबंध की स्पष्ट शर्त थी कि सेवा शुरू होने की तिथि पर कोई भी वाहन एक वर्ष से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद सेवा में वर्ष 2020 के 41 वाहन और 2022 के 60 वाहन शामिल कर दिए गए, जिनमें से कई वाहन पहले ही 2 से 3 लाख किलोमीटर तक चल चुके हैं। इनमें से सिर्फ 46 वाहन 2025 मॉडल और एक वाहन 2024 मॉडल का है।
पुराने वाहनों की फिटनेस समाप्त होने और उनके लगातार खराब रहने के कारण शोकाकुल परिवारों को समय पर वाहन उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, वित्तीय अनियमितता का आलम यह है कि संचालन एजेंसी को प्रति वाहन 58 हजार रुपये प्रतिमाह दिए जा रहे हैं। इस प्रकार हर महीने 85.84 लाख रुपये और सालभर में लगभग 10 करोड़ 30 लाख 8 हजार रुपये का सरकारी भुगतान किया जा रहा है। कागजों पर पूरी संख्या दर्ज होने के बावजूद मौके पर हालात बेहद खराब हैं। 17 वाहन अपने संबंधित जिलों में उपलब्ध ही नहीं हैं।|
• नीमच और रतलाम में 2-2 तथा सिवनी में 2 वाहन तय स्थान पर उपलब्ध नहीं हैं।
• जबलपुर में 2 वाहन बंद पड़े हैं।
• इंदौर और शहडोल में तीन-तीन वाहन ही चालू स्थिति में हैं।
• राजधानी भोपाल में आवंटित 4 वाहनों में से 2 खराब पड़े हैं, जिनमें से एक का फिटनेस खत्म हो चुका है।
इस पूरे प्रकरण में विदिशा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने मिसाल पेश की। उन्होंने पुरानी गाड़ियाँ स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया और नई गाड़ियों की मांग रखी, जिसके बाद प्रशासन को विदिशा में सभी चार नए वाहन भेजने पड़े। वहीं दूसरी ओर, उप-मुख्यमंत्री के गृह जिले रीवा में भी 2 पुराने शव वाहन ही आवंटित किए गए हैं।
सरकारी नियमों के अनुसार सामान्य जिलों में दो-दो और मेडिकल कॉलेज वाले जिलों में चार-चार शव वाहन रखने की व्यवस्था है। लेकिन सेवा शुरू हुए एक वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी न तो पूरे वाहन उपलब्ध हैं और न ही इनका संचालन सुचारू रूप से हो पा रहा है। मामले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और संबंधित एजेंसी प्रबंधन की ओर से स्पष्ट जवाब देने से बचा जा रहा है।








