
सत्ता का नशा जब ब्यूरोक्रेसी के सिर चढ़कर बोलने लगे, तो अपनी ही सरकार के विधायक ‘बागी‘ तेवर अपनाने को मजबूर हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा सदन में देखने को मिला, जहाँ एक प्रमोटी IPS (SP साहब) की कार्यशैली ने इतना उबाल पैदा कर दिया कि मामला मुख्यमंत्री की चौखट से होता हुआ सीधे विधानसभा की दहलीज तक जा पहुँचा।
बंगले से जवाब आता है– ‘साहब दौरे पर हैं‘
विधायकों का गुस्सा इस बात पर फूटा कि जिले के ‘कप्तान‘ साहब ने जनता के प्रतिनिधियों से दूरी बना ली है। सदन में विधायकों ने आरोप लगाया कि:
- नो रिस्पॉन्स: साहब न तो फोन उठाते हैं और न ही ऑफिस में मुलाकात का समय देते हैं।
- दौरे का बहाना: बंगले पर कॉल लगाओ तो रटा–रटाया जवाब मिलता है— “साहब दौरे पर हैं।“
- वसूली का खेल: दोपहर ढलते ही सड़कों पर पुलिस की चेकिंग शुरू हो जाती है, जिसका मकसद सुरक्षा नहीं बल्कि ‘वसूली‘ बताया जा रहा है।
“पूर्व SP का अनुशासन और तालमेल याद आया“ सदन में करीब आधे घंटे तक चले हंगामे के दौरान विधायकों ने मौजूदा SP की तुलना पूर्व अधिकारी से कर डाली। उन्होंने कहा कि पहले तालमेल और सख्ती के बीच एक संतुलन था, लेकिन मौजूदा ‘साहब‘ के राज में सिर्फ अव्यवस्था का बोलबाला है।
बुलडोजर चलता रहा, पुलिस तमाशबीन बनी रही
सबसे तीखा प्रहार अवैध निर्माणों को लेकर हुआ। विधायकों ने आरोप लगाया कि एक तरफ शहर में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर गरज रहे हैं, और दूसरी तरफ पुलिस मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रही है। आखिर पुलिस की यह ‘चुप्पी‘ क्या संकेत दे रही है? क्या इसके पीछे कोई बड़ी ‘सेटिंग‘ है?
‘लोकतंत्र में जनसेवक या सुल्तान?’
यह स्थिति सरकार के लिए भी असहज करने वाली है। जब सत्ता पक्ष के विधायक ही अपनी सरकार के पुलिस अफसर के खिलाफ सदन में मोर्चा खोल दें, तो समझ लेना चाहिए कि ‘सिस्टम‘ में जंग लग चुकी है। अगर एक जिले का कप्तान अपने ही विधायकों की नहीं सुन रहा, तो आम जनता की सुनवाई का क्या आलम होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।







