
देश के कई हिस्सों में हाल ही में चले bulldozer action को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया है, जहां आरोप है कि प्रशासन ने केवल बंगाली मुस्लिम परिवारों के घर तोड़े, जबकि पास में मौजूद Hindus और Christian समुदायों के घरों को नहीं छुआ गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने केवल मुस्लिम बस्तियों को ही निशाना बनाया, जिसके बाद इलाके में भारी नाराज़गी और भय फैल गया। प्रभावित लोगों ने शिकायत की कि नोटिस दिए बिना तोड़फोड़ की गई, जबकि दूसरी तरफ समान स्थिति वाले हिंदू-ईसाई परिवारों के मकान पूरी तरह सुरक्षित बने रहे।
वहीं प्रशासन अपनी तरफ से सफाई दे रहा है कि यह तोड़फोड़ illegal encroachment removal drive का हिस्सा थी और इसमें धर्म या समुदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया। लेकिन स्थानीय सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखती है — क्योंकि टारगेटेड डिमॉलिशन का पैटर्न एक ही समुदाय पर केंद्रित दिखता है। कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके पास पुराने दस्तावेज़, बिजली-पानी कनेक्शन और टैक्स रिकॉर्ड मौजूद थे, फिर भी घरों पर पहले बुलडोज़र चला और बाद में कागज़ी कार्रवाई की गई।
इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है, जहाँ विपक्षी दलों ने इसे selective demolition करार देते हुए सरकार से जवाब मांगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कानून का इस्तेमाल एक ही समुदाय या एक ही इलाके पर केंद्रित तरीके से होता है, तो यह सामाजिक तनाव को बढ़ाता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास गहराता है। फिलहाल, पीड़ित परिवार न्याय और मुआवज़े की मांग कर रहे हैं, वहीं प्रशासन पूरे मामले की जांच और रिकॉर्ड सत्यापन की बात कह रहा है।

