
सरकारी टेंडर प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़े कारोबारी को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर से जुड़ी प्रक्रिया में बदलाव किया गया। बताया जा रहा है कि जिस समय टेंडर में भागीदारी की शर्तें पूरी नहीं हो पा रही थीं, उसी दौरान पोर्टल में संशोधन कर रास्ता साफ किया गया।
जानकारी के मुताबिक, संबंधित कारोबारी पहले टेंडर की तकनीकी शर्तों में सफल नहीं हो पा रहा था। इसके बाद अचानक पोर्टल को दोबारा खोला गया और आवश्यक बदलाव किए गए, जिससे उसे दोबारा आवेदन का मौका मिल गया। इस पूरी प्रक्रिया में नियमों को लचीला बनाने और चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
आरोप यह भी हैं कि टेंडर के दौरान दूसरे आवेदकों को समान अवसर नहीं मिला। जहां एक ओर कुछ कंपनियों को मामूली तकनीकी खामियों के चलते बाहर कर दिया गया, वहीं दूसरी ओर पसंदीदा कारोबारी के लिए नियमों की व्याख्या बदली गई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या टेंडर वास्तव में प्रतिस्पर्धा के आधार पर दिया गया या फिर पहले से तय था।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों से सरकारी टेंडर सिस्टम की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि सिस्टम के दुरुपयोग का मामला बन सकता है। अब जरूरत इस बात की है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच हो, ताकि सच सामने आ सके और भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचा जा सके।







