
भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमता को मजबूत करने के लिए प्रस्तावित 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों की डील को रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्तमान में Indian Air Force के पास स्वीकृत 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की तुलना में लगभग 13 स्क्वाड्रन की कमी है। कई पुराने मिग-21 और अन्य पुराने विमानों के चरणबद्ध रिटायरमेंट के कारण यह संख्या आगे और घटने की आशंका है। ऐसे में वायुसेना की परिचालन क्षमता और दो मोर्चों पर युद्ध की तैयारी को बनाए रखने के लिए आधुनिक बहु-भूमिका लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत बताई जा रही है।
114 राफेल विमानों की संभावित खरीद का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करना भी है। राफेल अत्याधुनिक रडार, लंबी दूरी की हवा-से-हवा मिसाइल, प्रिसिजन स्ट्राइक क्षमता और नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध प्रणाली से लैस माना जाता है। इससे वायुसेना को गहराई तक मार करने और हवाई श्रेष्ठता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा 36 राफेल विमानों ने पहले ही भारतीय वायु शक्ति में गुणात्मक बढ़त दिखाई है, इसलिए बड़े पैमाने पर इनकी तैनाती सामरिक संतुलन बदल सकती है।
क्षेत्रीय सुरक्षा परिप्रेक्ष्य में चीन और पाकिस्तान की संयुक्त हवाई क्षमता भारत के लिए प्रमुख चुनौती मानी जाती है। China के पास बड़ी संख्या में आधुनिक लड़ाकू विमान, स्टेल्थ क्षमता और उन्नत मिसाइल प्रणालियां हैं, जबकि Pakistan ने भी अपने बेड़े में आधुनिक मल्टीरोल फाइटर और लंबी दूरी के हथियार जोड़े हैं। दो-फ्रंट संभावित संघर्ष की स्थिति में भारत को पश्चिम और उत्तर दोनों दिशाओं में पर्याप्त स्क्वाड्रन तैनात रखने की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि स्क्वाड्रन संख्या की कमी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम के रूप में देखा जा रहा है।









