
भोपाल। मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा का स्तर आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। प्रदेश के विश्वविद्यालयों में गिरता शैक्षणिक स्तर, घटती छात्र संख्या और परिसर में पनपती राजनीति ने शिक्षा के मंदिर को ‘अखाड़ा‘ बना दिया है। नियमानुसार, प्रदेश के राज्यपाल सभी शासकीय विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor) होते हैं और कुलपतियों की नियुक्ति का सर्वाधिकार उनके पास होता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राजभवन की इस विषय में कोई जवाबदेही नहीं है?
कुलपतियों की नियुक्ति और राज्यपाल की भूमिका पर सवाल
प्रदेश में उच्च शिक्षा की कमान राज्यपाल के हाथों में होती है। वे चाहें तो अपनी शक्तियों का प्रयोग कर पूरे शिक्षा तंत्र को नई दिशा दे सकते हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि राजभवन को शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के भविष्य से कोई विशेष सरोकार नहीं रह गया है। विश्वविद्यालयों में विजनरी नेतृत्व के बजाय ऐसी नियुक्तियाँ हो रही हैं, जिससे सुधार की गुंजाइश खत्म होती जा रही है।
प्रोफेसरों की ‘नेतागिरी‘ और प्रभावित होती पढ़ाई
आज प्रदेश के विश्वविद्यालयों का हाल यह है कि प्रोफेसरों का ध्यान शोध और अध्यापन से हटकर राजनीति और गुटबाजी पर अधिक है। कक्षाओं में व्याख्यान कम और प्रशासनिक गलियारों में ‘चाटुकारिता‘ अधिक दिखाई देती है। जब शिक्षक ही राजनीति में व्यस्त रहेंगे, तो शिक्षा का स्तर गिरना निश्चित है। राजभवन की ओर से इन गतिविधियों पर कोई कड़ा अंकुश न लगाया जाना राज्यपाल की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
घटती छात्र संख्या: आखिर क्यों डर रहे हैं विद्यार्थी?
विश्वविद्यालयों की इस दुर्दशा का सीधा असर प्रवेश प्रक्रिया पर पड़ा है। छात्रों के मन में अब इन संस्थानों में प्रवेश लेने को लेकर भय व्याप्त है:
- सत्र की देरी: समय पर परीक्षा न होना और परिणामों में धांधली।
- आधारभूत संरचना का अभाव: पुरानी तकनीक और जर्जर व्यवस्था।
- भविष्य की अनिश्चितता: डिग्री मिलने के बाद भी रोजगार के लिए भटकते युवा।
इन्हीं कारणों से अब छात्र निजी विश्वविद्यालयों या प्रदेश से बाहर पलायन करने को मजबूर हैं। सरकारी विश्वविद्यालयों के पास अब छात्रों का अकाल पड़ता जा रहा है।
सुधारात्मक कदम या सिर्फ औपचारिकता?
यदि राज्यपाल महोदय अपनी संवैधानिक शक्तियों का सही उपयोग करें, तो मध्यप्रदेश का शिक्षा जगत पुनः अपनी खोई हुई गरिमा प्राप्त कर सकता है। केवल कुलपतियों की नियुक्ति कर देना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके कार्यों की समीक्षा करना और विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त करना भी कुलाधिपति की जिम्मेदारी है। क्या राजभवन इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाएगा, या मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा इसी तरह ‘राम भरोसे‘ चलती रहेगी?







