
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ही नाम की चर्चा है और वो नाम है— ‘सख्ती’। एक ऐसे ACS (अतिरिक्त मुख्य सचिव) साहब की एंट्री हुई है, जिन्होंने सीनियर अफसरों के उस पुराने ढर्रे को बदल कर रख दिया है, जहाँ ‘काम बाद में और सैर-सपाटा पहले’ होता था।
कहते हैं जब कप्तान सख्त हो, तो टीम को लाइन पर आना ही पड़ता है। कुछ ऐसा ही नज़ारा आजकल विभाग के दफ्तरों में दिख रहा है।
- खत्म हुआ ‘कार्योत्तर अनुमोदन’ का खेल: पहले सीनियर अफसर देश के किसी भी राज्य की सैर करके लौट आते थे और फिर औपचारिकता के लिए अनुमति की फाइल आगे बढ़ा देते थे। इसे ‘पोस्ट-फैक्टो अप्रूवल’ या कार्योत्तर अनुमोदन कहा जाता था।
- आधा दर्जन फाइलों पर ‘रेड सिग्नल’: नए साहब ने आते ही ऐसी आधा दर्जन फाइलों पर कड़ी आपत्ति दर्ज की, जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया।
- अब पहले मुहर, फिर टिकट: साहब के कड़े रुख का असर यह है कि अब बिना लिखित अनुमति के यात्राओं का सिलसिला थम गया है। अब अफसर पहले अनुमति की मुहर लगवा रहे हैं, उसके बाद ही अपनी टिकट बुक करा रहे हैं।
साहब का कड़ा संदेश: “नियमों से चलो, प्रक्रिया का पालन करो”
नए ACS ने केवल सख्ती ही नहीं दिखाई, बल्कि काम करने का तरीका भी साफ कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट लहजे में अफसरों से कह दिया है कि:
1.छोटी-छोटी बातों के लिए उन्हें बार-बार डिस्टर्ब न किया जाए।
2.फाइल पूरी तैयारी और तथ्यों के साथ ही टेबल पर आनी चाहिए।
3.नियमों और प्रक्रिया का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा।
साफ है कि अब दफ्तरों का रौब और रसूख फाइलों की मजबूती और नियमों की पाबंदी में सिमट गया है। जो अफसर पहले ‘मनमौजी’ थे, अब वे साहब के डर से ‘अनुशासित’ नजर आ रहे हैं। मध्य प्रदेश प्रशासन में आया यह बदलाव चर्चा का विषय बना हुआ है।









