
RTI और सरकारी दस्तावेजों के जरिए सामने आया नीतियों का वो ‘गुप्त खेल’, जिसपर मुख्यधारा की मीडिया पूरी तरह खामोश है।
क्या आपने कभी सोचा है कि देश की संसद और फाइलों के पीछे कुछ ऐसे फैसले भी लिए जा रहे हैं, जो सीधे आपकी जेब, आपके अधिकारों और 140 करोड़ भारतीयों के भविष्य को प्रभावित करते हैं? लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन बड़े बदलावों का कोई ढिंढोरा नहीं पीटा जाता। इन्हें पूरी खामोशी के साथ लागू कर दिया जाता है। इसे आप सरकार का ‘अदृश्य घोषणापत्र’ कह सकते हैं। आज ब्रांडवाणी समाचार पर हम उस ‘खामोश खेल’ का पर्दाफाश करने जा रहे हैं, जिसके सबूत RTI यानी सूचना के अधिकार और सरकारी नियुक्ति आदेशों की फाइलों में दबे हुए थे।
खोजी पत्रकरिता ब्रांडवाणी समाचार की एक खोजी रिपोर्ट ने देश की नीतिगत गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। इस रिपोर्ट में तीन ऐसे बड़े और ‘खामोश’ बदलावों का दावा किया गया है, जो सीधे देश की जनता के भविष्य को तय करने वाले हैं। आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर पर्दे के पीछे क्या छिपाया जा रहा है।
बदलाव नंबर 1: RTI (सूचना का अधिकार) पर खामोश प्रहार?
पहला और सबसे बड़ा बदलाव है जनता के सबसे बड़े हथियार यानी RTI एक्ट में प्रशासनिक फेरबदल। जो कानून आम आदमी को सरकार से सवाल पूछने की ताकत देता था, अब उसके भीतर की नियुक्तियों और नियमों को इस तरह बदला जा रहा है जिससे आम जनता तक सटीक जानकारी पहुंचना और मुश्किल हो जाए। आरटीआई के तहत मिलने वाली जानकारियां अब फाइलों में ‘हिडन’ यानी गुप्त की जा रही हैं।
बदलाव नंबर 2: नियुक्तियों के नियमों में गुप्त खेल
दूसरा बड़ा बदलाव देश की प्रशासनिक व्यवस्था और महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्तियों को लेकर है। लेटरल एंट्री और चुनिंदा ‘अपॉइंटमेंट ऑर्डर्स’ के जरिए नीति निर्धारण करने वाली जगहों पर ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे पूरी व्यवस्था का ढांचा बदल रहा है। इस ‘साइलेंट रिफॉर्म’ की भनक आम जनता को तब लगती है जब कानून बनकर तैयार हो जाता है।
बदलाव नंबर 3: सार्वजनिक नीति में गुप्त बदलाव
तीसरा बदलाव है देश की आर्थिक और सार्वजनिक नीतियों में किया गया वो फेरबदल, जो सीधे कॉर्पोरेट और आम जनता के बीच के संतुलन को प्रभावित करता है। बिना किसी बड़े जन-विमर्श के, पब्लिक पॉलिसी के बुनियादी नियमों को बदला जा रहा है, जिसका सीधा असर देश के 140 करोड़ लोगों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर पड़ेगा।
क्या लोकतंत्र में जनता को यह जानने का हक नहीं है कि उनके लिए नीतियां किस आधार पर बनाई जा रही हैं? आखिर इन बड़े बदलावों को मुख्यधारा की मीडिया में जगह क्यों नहीं मिलती? ‘ब्रांडवाणी समाचार’ देश की जनता को जागरूक करने के लिए इन छिपे हुए दस्तावेजों और नीतियों की परतों को खोलता रहेगा। इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
देश के भीतर इस समय नीतिगत स्तर पर एक ऐसा ‘खामोश खेल’ चल रहा है, जिससे आम जनता पूरी तरह बेखबर है। खोजी पत्रकरिता ब्रांडवाणी समाचार द्वारा जारी किए गए खोजी दस्तावेजों (RTI और सरकारी नियुक्ति पत्रों) ने देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में एक नई बहस छेड़ दी है। इसे 140 करोड़ भारतीयों के भविष्य से जुड़ा एक ‘अदृश्य घोषणापत्र’ कहा जा रहा है।
मुख्यधारा की मीडिया की चुप्पी पर उठे सवाल विशेषज्ञों का मानना है कि देश की सार्वजनिक नीतियों और सूचना के अधिकार के नियमों में पिछले कुछ समय में बेहद सूक्ष्म लेकिन दूरगामी बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों को लेकर संसद या सार्वजनिक मंचों पर कोई बड़ी बहस नहीं देखी गई, जिसके कारण इन्हें ‘खामोश बदलाव’ की संज्ञा दी जा रही है।
1. RTI की शक्तियों को सीमित करना: सूचना के अधिकार के तहत जो सरकारी जानकारियां आसानी से मिल जाती थीं, अब उन प्रक्रियाओं को जटिल बना दिया गया है।
2. प्रशासनिक नियुक्तियों में नया ट्रेंड: महत्वपूर्ण सरकारी और नीति-निर्धारक पदों पर होने वाली नियुक्तियों के नियमों में गुपचुप तरीके से बड़े बदलाव किए गए हैं।
3. पब्लिक पॉलिसी का कॉर्पोरेटीकरण: जनता से जुड़ी बुनियादी नीतियों में इस तरह से फेरबदल किया जा रहा है जिससे आने वाले समय में आम आदमी के अधिकार सीमित हो सकते हैं।
ब्रांडवाणी समाचार इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नज़र बनाए हुए है। लोकतंत्र में पारदर्शिता सबसे अहम है, और यदि नीतियों को जनता से छिपाकर बदला जा रहा है, तो यह देश के भविष्य के लिए एक बड़ा चिंता का विषय है।
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