AI के दौर में ‘अडानी इकोनॉमिक्स’, क्या तकनीक के नाम पर देश के संसाधनों पर कब्जा करने का है नया खेल?

तकनीक की दुनिया तेज़ी से बदल रही है, और इस बदलाव में जो नाम सबसे तेज़ी से खुद को स्थापित करने में जुटा है, वह है अडानी समूह। आज हम बात करेंगे ‘AI’ यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अडानी की उस क्रोनी इकोनॉमिक्स की, जो भविष्य के भारत पर अपना पूरा नियंत्रण बनाने की तैयारी कर रही है।

सवाल यह है कि क्या AI सिर्फ एक तकनीकी क्रांति है, या फिर यह अडानी जैसे बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों के लिए देश के संसाधनों को नए तरीके से अपने कब्जे में लेने का एक बड़ा ज़रिया बन चुका है? दरअसल, AI को सुचारू रूप से चलाने के लिए भारी मात्रा में डेटा सेंटर्स, ज़मीन और असीमित बिजली की ज़रूरत होती है। और हैरान करने वाली बात यह है कि भारत में इन तीनों ही मोर्चों पर अडानी समूह अपनी मोनोपॉली (एकाधिकार) स्थापित करने की रेस में सबसे आगे खड़ा है।

ब्रांडवाणी समाचार के विश्लेषण के मुताबिक, आम जनता को यह दिखाया जा रहा है कि यह देश की तरक्की है। लेकिन पर्दे के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि तकनीक के इस नए दौर में भी आम आदमी को सिर्फ एक उपभोक्ता बनाकर छोड़ दिया जाएगा, जबकि मलाईदार मुनाफ़ा सिर्फ एक विशेष उद्योगपति की झोली में जाएगा। कोयले और बंदरगाहों से लेकर अब सीधे आपके डिजिटल डेटा और एआई की रीढ़ कहे जाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर पर अडानी का शिकंजा कसता जा रहा है।

क्या सरकार की नीतियां इस तरह बनाई जा रही हैं जिससे इस नए तकनीकी युग में भी प्रतियोगिता खत्म हो जाए और सिर्फ एक ही खिलाड़ी मैदान में बचे? जब बिजली से लेकर डेटा स्टोरेज तक सब कुछ एक ही समूह के नियंत्रण में होगा, तो क्या देश की संप्रभुता और आम आदमी की डिजिटल गोपनीयता सुरक्षित रह पाएगी?

‘AI और अडानी’ के इस गठजोड़ की क्रोनोलोजी को समझना बेहद ज़रूरी है। यह सिर्फ तकनीक की बात नहीं है, यह आने वाले दशकों की पूरी अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने की वो चाल है, जिसे वक्त रहते समझना देश के लिए बेहद ज़रूरी है।

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