
मप्र में जहरीली शराब कोई अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। यह उस अवैध नेटवर्क का नतीजा है जो शराब बनाने, कच्चा माल जुटाने, मिलावट करने, गांव-कस्बों तक पहुंचाने और अंत में उपभोक्ता तक बेचने की पूरी श्रृंखला पर टिका है। इस नेटवर्क की सबसे भयावह तस्वीर तब सामने आती है, जब किसी गांव या कस्बे में एक साथ कई घरों के चूल्हे बुझ जाते हैं। अस्पताल भर जाते हैं। पुलिस और प्रशासन घटनास्थल पर पहुंचता है। कुछ गिरफ्तारियां होती हैं। कुछ अफसर निलंबित किए जाते हैं। जांच समितियां बनती हैं। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू होते हैं। लेकिन कुछ समय बाद तस्वीर फिर बदल जाती है और व्यवस्था अपनी सामान्य गति से चलने लगती है। लेकिन आज तक यह साफ सामने नहीं आया है कि आखिरकार जहरीली शराब से होने वाली मौतों का असली जिम्मेदार कौन है? सवाल यह कि जहरीली शराब बनती कहां है, बिकती कैसे है और जिम्मेदार तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगती?
मप्र के सागर जिले में जहरीली शराब से हुई 33 (सरकारी आंकड़ों में 9) मौतों ने इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है कि क्या कार्रवाई का मकसद अवैध शराब के नेटवर्क को तोड़ना है या हादसे के बाद कुछ चेहरों पर कार्रवाई कर मामले को शांत करना? सागर की घटना में 100 से ज्यादा लोगों की तबीयत बिगड़ने और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की बात सामने आई। बांदा के सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान 33 लोगों की दर्दनाक मौत हुई। घटना के बाद कलेक्टर प्रतिभा पाल और एसपी अनुराग सुजानिया ने घटनास्थल का जायजा लिया। पुलिस ने करीब 30 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आरोपियों की गिरफ्तारी की गई। इसके बाद प्रशासन की ओर से भी कार्रवाई शुरू हुई और अवैध शराब तथा उससे जुड़े मामलों में कार्रवाई की गई।
घटना के बाद पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने कई स्थानों पर कार्रवाई की। प्रशासन ने शराब माफिया और सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की। गत दिनों पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम ने कुछ क्षेत्रों में बड़ा बुलडोजर एक्शन लिया। एनएच-44 किनारे शासकीय भूमि पर बने 70 से अधिक अवैध होटल और टपरे जमींदोज कर दिए गए। इसमें मुख्य आरोपियों के अवैध निर्माण भी शामिल बताए गए। जहरीली शराब कांड के आरोपी शराब कारोबारी कुशवाहा और अन्य संबंधित लोगों के होटल और रिसॉर्ट पर प्रशासन की कार्रवाई की गई और कुछ आरोपियों को पुलिस मुख्यालय से अटैच कर दिया गया।
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