नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के इक्विटी नियमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। एक ओर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए भेदभाव से सुरक्षा की मांग है, वहीं दूसरी ओर सामान्य और सवर्ण वर्ग के संगठनों ने नियमों के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले केंद्र सरकार ने इन नियमों की समीक्षा के लिए समिति बनाने की बात कही है।
UGC नियमों को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और समानता को बढ़ावा देने के लिए 2026 के नए नियम जारी किए थे। इन नियमों के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर केंद्र और इक्विटी समितियां बनाने का प्रावधान किया गया।
नियमों में SC, ST और OBC समुदायों के खिलाफ जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए व्यवस्था की गई। हालांकि, सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों और छात्रों ने इस प्रावधान पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों को समान सुरक्षा नहीं मिलती और झूठी शिकायतों के दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं।
विवाद बढ़ने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 29 जनवरी 2026 को शीर्ष अदालत ने नए नियमों पर रोक लगा दी थी और 2012 के पुराने नियमों को आगे के आदेश तक जारी रखने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने समिति बनाने की बात कही
5 नवंबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि UGC के 2026 के नियमों की दोबारा समीक्षा के लिए समिति गठित करने पर विचार किया जा रहा है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को इसकी जानकारी दी।
सरकार का कहना है कि नियमों में ऐसा संतुलन होना चाहिए, जिससे किसी भी वर्ग के छात्र को भेदभाव का सामना न करना पड़े और किसी को भी नियमों के दुरुपयोग की आशंका न रहे।
फिलहाल समिति के गठन, उसके सदस्यों और समीक्षा की समय-सीमा को लेकर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे नियमों की वापसी या बदलाव का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
चुनाव से पहले BJP के सामने जातीय समीकरण की चुनौती
UGC विवाद का असर अब राजनीतिक बहस में भी दिखाई दे रहा है। खासकर उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए BJP के लिए सवर्ण और पिछड़े वर्गों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
पार्टी को एक ओर OBC, SC और ST समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर सवर्ण वर्ग की नाराजगी को भी दूर करना है। रिपोर्टों के अनुसार, RSS ने भी नियमों के प्रावधानों को लेकर अपनी चिंताएं सरकार तक पहुंचाई हैं और सामाजिक समरसता बनाए रखने पर जोर दिया है।
विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठा रहा है। ऐसे में UGC नियमों की समीक्षा का फैसला केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है।
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से समिति बनाने पर विचार किया जा रहा है। अंतिम निर्णय और नियमों में संभावित बदलाव समिति की समीक्षा तथा सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होंगे।
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