
जब भी प्रशासनिक विफलता के कारण मौतें होती हैं तो सरकार आनन-फानन में छोटे अधिकारियों और कर्मचारियों पर गाज गिरा देती है। लेकिन बड़े अफसरों पर कभी-कभार ही कार्रवाई होती है। अगर सागर की घटना को लें तो सारी मौतों के लिए जिले के कलेक्टर और एसपी जिम्मेदार हैं, क्योंकि जिले का पूरा अमला इन्हीं की देखरेख में काम करता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि सरकार ने कलेक्टर प्रतिभा पाल और एसपी अनुराग सुजानिया के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया है। दरअसल, पूरे प्रशासन का फोकस केवल जिला मुख्यालय पर रहता है।
प्रशासनिक और पुलिस के अमले की भले ही गांवों में ड्यूटी लगाई जाती है, लेकिन वे मुख्यालय से दूर जाना नहीं चाहते हैं। इस कारण निगरानी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है। अगर जानकारों की मानें तो जहरीली शराब बनने और बिकने तक शराब माफिया, तस्करों और अधिकारियों की मिलीभगत रहती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर अवैध शराब के ठिकानों की जानकारी आबकारी विभाग के रिकॉर्ड में पहले से मौजूद थी, तो फिर इन पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। सागर की घटना के बाद छोटे स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई तो हुई, लेकिन कलेक्टर और एसपी पर सख्त कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
अवैध शराब के बारे में आम धारणा है कि देसी शराब ही जहरीली होती है, यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। कानूनी तरीके से बनाई गई देसी शराब भी लाइसेंस, निर्धारित प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण के तहत तैयार होती है। समस्या उस शराब से है जो गैरकानूनी तरीके से तैयार की जाती है, जिसमें लागत कम करने, नशा बढ़ाने या उत्पादन तेजी से करने के लिए खतरनाक पदार्थों की मिलावट की जाती है। इसे आम बोलचाल की भाषा में कच्ची शराब कहा गया है। अवैध शराब बनाने में गुड़, पानी और यूरिया जैसे पदार्थों के इस्तेमाल का उल्लेख है। इसी वजह से जहरीली शराब के नेटवर्क और उस पर निगरानी रखने वाले तंत्र की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
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