
कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस पहले भी होती रही है, लेकिन इस बार इसका राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि मुख्यमंत्री खुद बैठक में शामिल होंगे। नए मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल के साथ मुख्यमंत्री की यह अहम समीक्षा बैठक प्रशासनिक प्राथमिकताओं का नया संकेत भी दे सकती है। मुख्यमंत्री की सीधी मौजूदगी का मतलब यह है कि जिलों की रिपोर्ट अब केवल मुख्य सचिवालय तक सीमित नहीं रहेगी। कलेक्टरों को सीधे यह बताना होगा कि शासन की प्राथमिकताओं को उन्होंने अपने जिले में किस तरह लागू किया। इससे प्रशासनिक हलकों में संदेश गया है कि जिले का प्रदर्शन अब सिर्फ विभागीय फाइलों का विषय नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की निगरानी का हिस्सा होगा।
कॉन्फ्रेंस का एक बड़ा बदलाव इसका फॉर्मेट माना जा रहा है। पहले लंबे एजेंडे के कई बिंदुओं पर विस्तार से प्रस्तुतियां होती थीं। इस बार जरूरी और पिन-पॉइंट मुद्दों पर निर्धारित समय में समीक्षा करने की तैयारी है। इसका फायदा यह होगा कि बैठक में सामान्य आंकड़ों की प्रस्तुति के बजाय उन जिलों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा जहां किसी योजना की प्रगति कमजोर है या प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं। यानी जिस जिले का प्रदर्शन अच्छा होगा, वह आंकड़ों के साथ सामने आएगा और जहां कमी होगी, वहां कलेक्टर से उसका कारण पूछा जाएगा।
परफॉर्मेंस रैंकिंग का विचार अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका मकसद केवल अधिकारियों को नंबर देना नहीं, बल्कि जिलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करना भी हो सकता है। यदि किसी जिले में राजस्व प्रकरणों का तेजी से निराकरण हो रहा है, योजनाओं का लाभ पात्र हितग्राहियों तक पहुंच रहा है और अधिकारी नियमित रूप से फील्ड में जा रहे हैं, तो उसका प्रदर्शन दूसरे जिलों के लिए भी मानक बन सकता है। दूसरी तरफ लगातार कमजोर प्रदर्शन करने वाले जिलों पर स्वाभाविक रूप से ज्यादा निगरानी रहेगी। यही वह बिंदु है जहां रैंकिंग प्रशासनिक मूल्यांकन से आगे बढ़कर अधिकारियों की जवाबदेही का औजार बन सकती है।
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