
शिवपुरी/ रानू परिहार: मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की पिछोर तहसील अब भू-विज्ञान के विश्व मानचित्र पर चर्चा में है। कुटावली गांव के पास स्थित चट्टानी क्षेत्र में दुनिया का दूसरा सबसे प्राचीन ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट पाया गया है। U-Pb जिरकॉन डेटिंग के जरिए इसकी उम्र करीब 2.56 अरब वर्ष यानी 256 करोड़ साल निर्धारित हुई है। शोध में यहां 3.5 अरब साल तक पुराने जिरकॉन कण भी मिले हैं, जो पृथ्वी की प्राचीन भूपर्पटी से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।
कुटावली की चट्टानों में छिपा अरबों साल पुराना इतिहास
शिवपुरी जिले की पिछोर तहसील का कुटावली गांव अब सिर्फ स्थानीय पहचान तक सीमित नहीं रहा। यहां के पुराने पहाड़ और चट्टानी क्षेत्र में मिले ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट ने इस इलाके को अंतरराष्ट्रीय भू-विज्ञान के नक्शे पर ला दिया है। हाल ही में प्रकाशित शोध के अनुसार यहां मौजूद ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट करीब 2.56 अरब वर्ष यानी 256 करोड़ साल पुराना है।
इस खोज की खास बात यह है कि इसे दुनिया के सबसे पुराने ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट स्थलों में दूसरा स्थान मिला है। इससे पहले पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का एक स्थल इस श्रेणी में दर्ज था।
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल Geosystems and Geoenvironment में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में भारत और विदेश की कई वैज्ञानिक संस्थाओं के शोधकर्ता शामिल रहे।
क्या होता है ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट?
ग्रेनाइट आम तौर पर मिलने वाली आग्नेय चट्टान है, लेकिन ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट बेहद दुर्लभ माना जाता है। दुनियाभर में इसके 100 से भी कम ज्ञात स्थल बताए जाते हैं। इसकी पहचान चट्टान के भीतर बनने वाली गोलाकार संरचनाओं से होती है, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में Orbicules कहा जाता है।
कुटावली की चट्टानों में दिखाई देने वाली ये गोल आकृतियां कई जगहों पर करीब 30 सेंटीमीटर व्यास तक की हैं। इनके बीच एक कोर होता है और उसके चारों तरफ क्वार्ट्ज तथा फेल्डस्पार जैसे खनिजों की संकेंद्रित परतें दिखाई देती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार इन संरचनाओं के बनने के पीछे मैग्मा में तापमान में अचानक बदलाव और तेजी से ठंडा होने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण रही होगी। गर्म मैग्मा के दो अलग-अलग हिस्सों के मिलने और उसके बाद होने वाली अंडरकूलिंग प्रक्रिया के दौरान इन विशिष्ट गोल संरचनाओं के बनने की व्याख्या की गई है।
छह किलो चट्टान से मिले सिर्फ 10 जिरकॉन
इस चट्टान की उम्र निर्धारित करना भी आसान नहीं था। वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरेनियम-लीड यानी U-Pb जिरकॉन डेटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया।
जिरकॉन ऐसा खनिज है जो अपने निर्माण के समय यूरेनियम को संरचना में समाहित कर सकता है। समय के साथ यूरेनियम रेडियोधर्मी क्षय के जरिए लेड में बदलता रहता है। यूरेनियम और लेड के अनुपात का विश्लेषण कर वैज्ञानिक चट्टान के बनने की उम्र का अनुमान लगा सकते हैं।
कुटावली के ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट में जिरकॉन की मात्रा बहुत कम पाई गई। शोध के दौरान करीब 6 किलो चट्टान को प्रोसेस करने के बाद सिर्फ 10 जिरकॉन कण प्राप्त हुए। इन्हीं बेहद सीमित नमूनों के विश्लेषण से चट्टान की प्राचीन उम्र निर्धारित की गई।
3.5 अरब साल पुराने जिरकॉन ने बढ़ाया रहस्य
शोध में सबसे महत्वपूर्ण संकेत उन जिरकॉन कणों से मिले जो खुद ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट की उम्र से भी काफी पुराने थे। कुछ Inherited Zircon कणों की उम्र करीब 3.5 अरब वर्ष तक पाई गई।
इसका मतलब यह है कि करीब 2.56 अरब वर्ष पहले जब यह ग्रेनाइट बना, तब उससे भी पुरानी महाद्वीपीय भूपर्पटी के कुछ हिस्सों के पिघलकर नए मैग्मा में शामिल होने के संकेत मौजूद थे।
यानी कुटावली की चट्टान सिर्फ अपने निर्माण की कहानी नहीं बताती, बल्कि उससे कहीं पुराने भूवैज्ञानिक इतिहास के अंश भी अपने भीतर संजोए हुए है।
बुंदेलखंड क्रेटन का अहम हिस्सा
कुटावली का यह क्षेत्र बुंदेलखंड क्रेटन का हिस्सा है। क्रेटन पृथ्वी की महाद्वीपीय भूपर्पटी के बेहद पुराने और अपेक्षाकृत स्थिर हिस्से होते हैं, जो लंबे भूवैज्ञानिक कालखंडों तक टिके रहते हैं।
ऑर्बिकुलर ग्रेनाइट का उल्लेख वैज्ञानिक साहित्य में वर्ष 2004 में किया गया था। हालांकि उस समय इसकी सटीक उम्र निर्धारित नहीं की गई थी। नए शोध में उम्र के साथ-साथ इसके मैग्मा के स्रोत को समझने की दिशा में भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है।
नियोडिमियम आइसोटोप के विश्लेषण से संकेत मिला है कि इस ग्रेनाइट का मैग्मा सीधे पृथ्वी के मेंटल से नहीं आया था, बल्कि पहले से मौजूद महाद्वीपीय परत के पिघलने से इसका निर्माण हुआ।
राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल बनाने की प्रक्रिया
इस दुर्लभ भूवैज्ञानिक स्थल के महत्व को देखते हुए इसे राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल (National Geoheritage Site) का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी GSI की ओर से संरक्षण की दिशा में कदम उठाए जाने की बात कही गई है।
यदि इसे आधिकारिक भू-विरासत स्थल का दर्जा मिलता है तो क्षेत्र में वैज्ञानिक अध्ययन, संरक्षण और भू-पर्यटन को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
कृषि विस्तार और पत्थर तोड़ने से खतरा
अरबों साल पुराना यह भूवैज्ञानिक इतिहास फिलहाल पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। शोधकर्ताओं ने क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है। कृषि विस्तार और स्थानीय स्तर पर पत्थर तोड़े जाने जैसी गतिविधियों से इन दुर्लभ चट्टानों के नष्ट होने का खतरा बताया गया है।
ऐसे में संरक्षण केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ये चट्टानें पृथ्वी की प्रारंभिक भूपर्पटी और उसके विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध कराती हैं।
शोध से पर्यटन और शिक्षा को भी मिल सकता है बढ़ावा
अगर इस क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीके से भू-विरासत और जियो-पार्क के रूप में विकसित किया जाता है तो पिछोर में वैज्ञानिक पर्यटन की नई संभावनाएं बन सकती हैं। देश-विदेश के भू-विज्ञानी, शोधार्थी और विद्यार्थी यहां अध्ययन के लिए पहुंच सकते हैं।
शिवपुरी और आसपास के क्षेत्र के स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों के लिए भी यह स्थान भू-विज्ञान की व्यावहारिक समझ विकसित करने का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
कुटावली की चट्टानों ने यह साबित किया है कि पिछोर की पहचान सिर्फ वर्तमान घटनाओं और राजनीति तक सीमित नहीं है। 256 करोड़ साल पुरानी ये चट्टानें पृथ्वी के उस दौर की कहानी अपने भीतर समेटे हैं, जब आज की दुनिया और जीवन का स्वरूप भी मौजूद नहीं था। अब चुनौती इस भूवैज्ञानिक विरासत को सुरक्षित रखने की है, ताकि अरबों साल पुराना यह प्राकृतिक इतिहास आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।
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