
वाराणसी की रामनगर रामलीला करीब दो सदियों से अपनी पारंपरिक शैली में जारी है। समय के साथ तकनीक, परिवहन और पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन रामलीला के मूल स्वरूप और मंचन की परंपरा में बड़ा बदलाव नहीं आया। अनंत चतुर्दशी के बाद लगातार 31 दिनों तक रामनगर की गलियां और लीला स्थल रामकथा के प्रसंगों से जीवंत हो उठते हैं।
वाराणसी की पहचान केवल गंगा घाटों और मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहां की सांस्कृतिक परंपराओं में रामनगर की रामलीला का भी खास स्थान है। आधुनिक दौर में जब मनोरंजन के साधन और मंचन की तकनीक तेजी से बदल गई है, तब भी रामनगर की रामलीला अपने पारंपरिक स्वरूप को सहेजे हुए है।
अनंत चतुर्दशी के बाद शुरू होने वाली यह रामलीला लगातार 31 दिनों तक चलती है। शाम ढलते ही रामनगर की गलियों में रामकथा के प्रसंगों का वातावरण बनने लगता है। अलग-अलग स्थानों पर रामायण के प्रसंगों का मंचन किया जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन्हें देखने पहुंचते हैं।
तकनीक बदली, लेकिन मंचन की परंपरा कायम
रामनगर की रामलीला की खासियत यह है कि आधुनिक सुविधाओं के दौर में भी इसका पारंपरिक स्वरूप काफी हद तक सुरक्षित रहा है। उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों में 1830 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी जेम्स प्रिंसेप द्वारा रामनगर की रामलीला का वर्णन और चित्रांकन मिलने का उल्लेख है। आज की तस्वीरों में भी आयोजन की मूल संरचना में निरंतरता दिखाई देती है।
रामलीला से जुड़े जानकारों के अनुसार, समय के साथ पेट्रोमैक्स और परिवहन जैसे साधनों में बदलाव जरूर आया, लेकिन मंचन की मूल परंपरा में परिवर्तन नहीं किया गया। यही निरंतरता इसे दूसरी जगहों पर होने वाली आधुनिक मंचीय प्रस्तुतियों से अलग पहचान देती है।
कभी नावों से पहुंचते थे रामनगर
आज लोग सड़क और पुलों के रास्ते रामनगर पहुंचते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब रामलीला के दौरान गंगा पार करने के लिए नावें प्रमुख साधन हुआ करती थीं।
शोध से जुड़े अरविंद अरुण मिश्रा के अनुसार, काशी के अस्सी से लेकर प्रह्लाद घाट तक कई घाटों से 100 से अधिक नावें रामलीला देखने जाने वाले नेमी श्रद्धालुओं को रामनगर पहुंचाती थीं। यह व्यवस्था पूरे 31 दिनों तक चलती थी। नावों पर सवार होकर लोग भजन गाते-बजाते रामनगर पहुंचते थे और यह आयोजन अपने आप में गंगा मेले जैसा वातावरण बना देता था।
बाद में परिवहन के साधन बदलते गए। पुलों के निर्माण के साथ लोग इक्का-तांगा और दूसरे साधनों से रामनगर पहुंचने लगे। आज सड़क मार्ग प्रमुख है, लेकिन रामलीला में शामिल होने और उसे देखने की श्रद्धा में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।
अभिनय से ज्यादा अनुष्ठान का भाव
रामनगर की रामलीला को केवल रंगमंचीय प्रस्तुति के तौर पर नहीं देखा जाता। इसकी परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान और श्रद्धा का भाव प्रमुख है। पात्रों के चयन से लेकर उनके प्रशिक्षण और मंचन तक कई पारंपरिक नियमों का पालन किया जाता है।
राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे प्रमुख पात्रों को उनके पात्रों के नाम से ही संबोधित करने की परंपरा है। मंचन के दौरान भी उनके प्रति उसी तरह का सम्मान रखा जाता है। पात्रों की तैयारी कई सप्ताह पहले शुरू हो जाती है।
खुले मैदानों में अलग-अलग स्थान बनते हैं अयोध्या और लंका
रामनगर की रामलीला का मंच किसी एक स्थायी मंच तक सीमित नहीं है। रामनगर दुर्ग से लेकर लंका तक अलग-अलग स्थानों पर रामायण के प्रसंगों का मंचन किया जाता है। अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, चित्रकूट और लंका जैसे स्थानों के नाम लीला के अलग-अलग पड़ावों से जुड़े हैं।
यही वजह है कि दर्शक केवल मंच के सामने बैठकर रामलीला नहीं देखते, बल्कि कथा के साथ अलग-अलग स्थानों तक पहुंचते हैं। इससे पूरी रामकथा एक चलते-फिरते विशाल मंच की तरह दिखाई देती है।
31 दिनों तक जारी रहती है रामकथा
रामनगर की रामलीला में कुल 31 लीलाओं का क्रम होता है। इसकी शुरुआत अनंत चतुर्दशी से होती है और समापन आश्विन शुक्ल चतुर्दशी के आसपास होता है। कई प्रसंगों को मंचित करने के बजाय रामचरितमानस की चौपाइयों और दोहों के गायन के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
हर दिन की लीला का समापन आरती से होता है। आरती भी इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है और कई श्रद्धालु विशेष रूप से आरती में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं।
समय बदलने के बावजूद रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी पहचान उसकी परंपरा की निरंतरता है। आधुनिक तकनीक और बदलते परिवहन साधनों के बीच भी रामकथा के मंचन का यह पारंपरिक तरीका पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।
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