
ब्रांडवाणी समाचार विशेष संपादकीय
संपादकीय डेस्क | राष्ट्रीय विमर्श
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त जनता की आवाज़ होती है, और इस आवाज़ की सबसे मुखर रीढ़ देश का युवा है। जब समाज, व्यवस्था या सत्ता अपने रास्ते से भटकती है, तब यही युवा सड़कों पर उतरकर उसे आईना दिखाता है। हाल ही में दीपक, सौरभ और आशुतोष की रिहाई और उसके साथ ही प्रशासन व न्यायपालिका द्वारा ‘शांति बनाए रखने’ की दी गई नसीहत कई असहज और तीखे सवाल खड़े करती है।
क्या अपने बुनियादी अधिकारों, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और नीतिगत विफलताओं पर सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध हो गया है कि युवाओं को क़ैद की सलाखों के पीछे धकेल दिया जाए? और फिर जब उन्हें सशर्त रिहा किया जाए, तो उन्हें चुप रहने और ‘शांति’ बनाए रखने का फ़रमान सुनाया जाए? यह दृश्य किसी भी संवेदनशील नागरिक को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या इस देश के युवाओं को अब अपनी बात रखने का भी अधिकार नहीं रहा?
सबसे चुभता हुआ सवाल यह है कि क्या सत्ता और क़ानून के शीर्ष पदों पर बैठे मठाधीशों की संतानें इस देश की युवा पीढ़ी का हिस्सा नहीं हैं? या फिर काली कमाई, अकूत संपत्ति और विशेषाधिकारों के बल पर उनके बच्चों के लिए विदेश और सुरक्षित ठिकाने तय हो चुके हैं, जिससे उन्हें ज़मीनी हक़ीक़त और आम नौजवानों के दर्द का कोई अहसास ही नहीं बचा है?
सवाल पूछने की पाबंद, क्या आवाज़ उठाना अपराध है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इसी प्रकार शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार हमारे बुनियादी लोकतांत्रिक ढाँचे का अभिन्न अंग है। लेकिन आज की व्यवस्था का मिज़ाज कुछ ऐसा बन चुका है कि सवाल पूछने वाले हर व्यक्ति को सीधे ‘अशांति फैलाने वाला’ मान लिया जाता है।
दीपक, सौरभ और आशुतोष जैसे युवा जब समाज की विसंगतियों पर बात करते हैं, भर्ती प्रक्रियाओं में धांधली पर आवाज़ उठाते हैं, या प्रशासनिक तंत्र में फैले भ्रष्टाचार की पोल खोलते हैं, तो तंत्र का पहला वार उनके आत्मसम्मान और उनकी आज़ादी पर होता है। उन्हें हिरासत में ले लिया जाता है, मुकदमों के फेर में फंसाया जाता है, और फिर जब रिहाई मिलती भी है, तो एक शर्त थोप दी जाती है “शांति बनाए रखें।”
यह ‘शांति’ आखिर कैसी शांति है? क्या यह वही शांति है जो किसी श्मशान या कब्रिस्तान में पसरी होती है? एक जीवंत लोकतंत्र में अगर असहमति, प्रतिरोध और सवाल न हों, तो वह लोकतंत्र महज़ एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है। शांति का अर्थ व्यवस्था के अत्याचारों और कुप्रबंध पर मूकदर्शक बन जाना नहीं हो सकता। यदि युवा चुप हो जाएगा, तो सत्ता की मनमानी पर लगाम कौन लगाएगा?
सत्ता प्रतिष्ठानों के वारिस बनाम ज़मीन पर संघर्ष करता आम युवा
आज देश में दो तरह के युवाओं का वर्ग साफ़ तौर पर उभर चुका है:
- विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग: नौकरशाहों, भ्रष्ट राजनेताओं और क़ानून की आड़ में काली कमाई करने वाले सिंडिकेट्स के बच्चे।
- संघर्षरत आम युवा: देश के कस्बों, गांवों और मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले नौजवान, जो एक-एक प्रतियोगी परीक्षा, एक-एक डिग्री और रोज़गार के लिए वर्षों पसीना बहाते हैं।
तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोगों के बच्चे अक्सर महँगे निजी स्कूलों, विदेशी विश्वविद्यालयों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सुरक्षित वातानुकूलित कमरों में ‘सेटल्ड’ हो जाते हैं। उन्हें न तो पेपर लीक के दर्द का अंदाज़ा होता है, न ही उस मानसिक तनाव का जो भर्ती प्रक्रिया के वर्षों तक लटकने से एक सामान्य युवा को झेलना पड़ता है। उन्हें यह नहीं सोचना पड़ता कि सड़क की गड्ढा-युक्त हालत, चरमराती स्वास्थ्य सेवाएं या प्रशासनिक घूसखोरी उनके भविष्य को कैसे निगल रही है।
जब जेबें भ्रष्टाचार की काली कमाई से भरी हों, तो आने वाली कई पीढ़ियों का भविष्य पहले ही सुरक्षित कर दिया जाता है। ऐसे में इन नीति-नियंताओं और न्याय के पहरुओं को यह कतई फ़र्क नहीं पड़ता कि आम नौजवान सड़कों पर लाठियां क्यों खा रहा है। उनके लिए सड़क पर उतरा हुआ हर दीपक, सौरभ या आशुतोष केवल एक ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की समस्या बन जाता है, कोई जीता-जागता इंसान या देश का भविष्य नहीं।
काली कमाई का संरक्षण और आम प्रतिभा का दमन
यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि देश में अवैध उगाही, दलाली और संस्थागत भ्रष्टाचार किस सीमा तक अपनी जड़ें जमा चुका है। चाहे वह खनन क्षेत्र में हो रहे घपले हों, सरकारी निर्माण कार्यों में कमीशनखोरी हो, या शिक्षा और भर्ती तंत्र में सीटों की खरीद-फरोख्त—हर जगह एक ऐसा वर्ग काबिज है जिसकी तिजोरियां अवैध धन से लबालब हैं।
“जब तंत्र की प्राथमिकता जनसेवा के बजाय काली कमाई का संचय बन जाए, तब सत्य बोलने वाला हर व्यक्ति अपराधी और झूठ की चाटुकारिता करने वाला हर व्यक्ति सम्मानित नागरिक मान लिया जाता है।”
इस व्यवस्था ने एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जहाँ:
भ्रष्टाचार की फ़ाइलें दबाने वाले अफ़सर पदोन्नति पाते हैं।
जनता के पैसे को लूटने वाले सिंडिकेट कानूनी दांव-पेच खेलकर खुलेआम घूमते हैं।
जबकि अपनी प्रतिभा, योग्यता और पसीने के दम पर आगे बढ़ने की कोशिश करने वाले युवाओं को झूठे मुकदमों और पुलिसिया दमन का सामना करना पड़ता है।
दीपक, सौरभ और आशुतोष को रिहा करते समय दी गई शांति की चेतावनी दरअसल इस बात का संकेत है कि तंत्र अपनी विफलताओं पर पर्दा डाले रखना चाहता है। वह नहीं चाहता कि कोई उसकी कार्यप्रणाली पर उंगली उठाए। वह नहीं चाहता कि कोई यह पूछे कि योजनाओं के अरबों रुपये कहाँ गए, रोज़गार के वादे कागज़ों से ज़मीन पर क्यों नहीं उतरे, और अफ़सरशाही इतनी निरंकुश क्यों हो गई।
न्याय का दोहरा मापदंड, पूंजीपतियों के लिए नरमी, युवाओं के लिए सख़्ती
न्यायपालिका और क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका किसी भी समाज में निष्पक्ष तराज़ू की तरह होनी चाहिए। लेकिन हालिया दौर में यह विरोधाभास बार-बार उजागर होता है:
बड़े आर्थिक अपराधियों और रसूखदारों के लिए: अदालतों के दरवाज़े आधी रात को भी खुल सकते हैं, तारीखें पर तारीखें मिलती हैं, और उन्हें ‘मानवीय आधार’ पर हर तरह की राहत और ज़मानत मिल जाती है।
अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले युवाओं के लिए: जेल की सलाखें, कठोर धाराएं और रिहाई के बाद भी निगरानी व पाबंदियों का शिकंजा कस दिया जाता है।
अगर देश के युवा अपनी जायज़ मांगों को लेकर आवाज़ भी न उठाएं, तो वे कहाँ जाएं? क्या क़ानून केवल इसलिए बनाया गया है कि वह ताक़तवर की ढाल और कमज़ोर की बेड़ी बन जाए? जब एक युवा को यह एहसास होने लगता है कि क़ानून का डंडा केवल उसी पर चलना है जिसकी जेब में पैसे या सत्ता की पहुंच नहीं है, तो उसका व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। और किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे ख़तरनाक स्थिति वह होती है जब उसकी युवा पीढ़ी का न्याय और संविधान से विश्वास डगमगाने लगे।
क्या ख़ामोशी ही देशभक्ति का नया पैमाना है?
अक्सर जब भी युवा व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं, तो उन पर अनुशासनहीनता या शांति भंग करने का ठप्पा लगा दिया जाता है। सत्ता पक्ष के पैरोकार यह तर्क गढ़ने लगते हैं कि व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने देने के लिए युवाओं को शांत रहना चाहिए।
लेकिन इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई भी बड़ा सुधार या क्रांति चुपचाप बैठने से नहीं आई। भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी युवाओं के इसी अदम्य साहस की देन था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़उल्ला ख़ां जैसे वीरों ने भी उस वक़्त की व्यवस्था से सवाल किए थे और तत्कालीन हुकूमत ने भी उन्हें ‘अशांति फैलाने वाला’ ही कहा था।
आज आज़ाद भारत में अगर अपने ही नागरिकों, अपने ही युवाओं की आवाज़ को दबाने के लिए वही औपनिवेशिक मानसिकता अपनाई जा रही है, तो यह आत्ममंथन का विषय है। युवाओं की आवाज़ दबाना देश की प्रगति की नब्ज़ को रोक देने जैसा है। दीपक, सौरभ और आशुतोष की रिहाई कोई एहसान नहीं है, यह उनका संवैधानिक अधिकार था; लेकिन उन पर शांति की शर्त मढ़ना व्यवस्था के डर को दिखाता है—उस सच के डर को जो ये युवा उजागर कर रहे थे।
ब्रांडवाणी समाचार का स्पष्ट दृष्टिकोण
ब्रांडवाणी समाचार स्पष्ट और निर्भीक शब्दों में यह मानता है कि राष्ट्र निर्माण युवाओं को चुप कराकर नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं का समाधान करके ही संभव है।
आवाज़ उठाने की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे: युवाओं को अपनी बात रखने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और व्यवस्था के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने का पूर्ण अधिकार बिना किसी भय के मिलना चाहिए।
सशर्त आज़ादी का खेल बंद हो: अधिकारों की मांग करने वालों को अपराधी की तरह ट्रीट करना और उन पर पाबंदियां लगाना बंद किया जाए।
संस्थागत भ्रष्टाचार पर प्रहार हो: जो काली कमाई व्यवस्था के पहरुओं को अंधी बना रही है, उसकी निष्पक्ष और कठोर जांच होनी चाहिए ताकि संसाधनों पर आम जनता का हक़ बहाल हो सके।
समान अवसर और जवाबदेही: सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि देश केवल उनके परिवारों या विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का नहीं है; यह देश उस अंतिम पंक्ति में खड़े नौजवान का भी है जो अपनी मेहनत से अपना भाग्य बदलना चाहता है।
दीपक, सौरभ और आशुतोष की रिहाई के बाद पैदा हुए हालात पूरे समाज और राष्ट्र के लिए एक चेतावनी हैं। यदि व्यवस्था ने समय रहते अपने अहंकार और भ्रष्टाचार को त्यागकर युवाओं की जायज़ आवाज़ को सुनना शुरू नहीं किया, तो यह तथाकथित ‘शांति’ किसी बड़े जनाक्रोश का पूर्व संकेत साबित होगी। लोकतंत्र को ज़िंदा रखना है, तो नौजवानों को बोलने की आज़ादी देनी ही होगी।
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