
राजधानी से सटे एक जिले के कलेक्टर साहब को हटवाने के लिए केंद्रीय मंत्रीजी ने पूरी ताकत लगा दी। कलेक्टर की कार्यशैली से मंत्रीजी इतने परेशान थे कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से विरोध जताया। आरोप है कि साहब ने तो उनकी बात तक नहीं सुनी और क्षेत्र की जनता के कामों को टालते रहे। कई बार कोशिश के बाद भी जब बात नहीं बनी तो मंत्रीजी धरने पर बैठ गए। मंत्रीजी की इस जिद के बाद विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष तक उनकी बातों की चर्चा होने लगी। मामला कुछ ऐसा बिगड़ा कि कलेक्टर को हटाने की मांग ने राजनीतिक रूप ले लिया। मंत्रीजी की नाराजगी और धरने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रशासनिक स्तर पर जल्द कोई निर्णय हो सकता है।
दिलचस्प बात यह थी कि कलेक्टर साहब खुद भी जिले से विदाई चाहते थे और सरकार भी उनका तबादला करने की तैयारी में थी। आधिकारिक तबादला सूची जारी हुई और कई कलेक्टर बदल दिए गए। लेकिन जिस कलेक्टर को हटाने के लिए मंत्रीजी ने इतना जोर लगाया था, उनका नाम सूची से गायब था। इस घटनाक्रम ने सभी को चौंका दिया। एक तरफ मंत्रीजी कलेक्टर को हटाने के लिए धरने तक पहुंच गए थे, वहीं दूसरी तरफ तबादला सूची में उनका नाम शामिल नहीं हुआ। जिस कार्रवाई की उम्मीद की जा रही थी, वह सूची जारी होने के बाद भी पूरी होती दिखाई नहीं दी।
अब मंत्रीजी के धरने का नतीजा ऐसा निकला कि बाकी कलेक्टर तो नई कुर्सियों पर पहुंच गए, लेकिन निशाने पर आए साहब अपनी जगह जमे रह गए। जिसे हटवाने निकले थे, उसी की कुर्सी बच गई। इसे कहते हैं—तबादले की लड़ाई में विरोधी भी कभी-कभी कवच बन जाता है। तस्वीर में खबर का मुख्य विषय यही है कि मंत्रीजी के विरोध और धरने के बावजूद कलेक्टर का तबादला नहीं हुआ। हालांकि, तस्वीर में जिले, कलेक्टर और केंद्रीय मंत्री के नाम स्पष्ट नहीं दिए गए हैं, इसलिए इस खबर में उनके नाम या तबादले के पीछे किसी अन्य कारण का अनुमान नहीं लगाया गया है।
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