वल्लभ भवन के ‘स्वयंभू’ भगवान: जब साहब से बड़े उनके ‘पीए’ हो जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे?

भोपाल। मध्यप्रदेश का शक्ति केंद्र ‘वल्लभ भवन’ इन दिनों जनसेवा के बजाय अफ़सरशाही के अहंकार का केंद्र बनता जा रहा है। विडंबना यह है कि यहाँ कुछ आईएएस अधिकारी खुद को जनता का सेवक नहीं बल्कि ‘विधाता’ समझने की भूल कर रहे हैं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती; इन अधिकारियों के निजी सहायक (PA) तो अपने आकाओं से भी दो कदम आगे निकल चुके हैं।

साहब से बड़े ‘साहब’ हुए पीए

मंत्रालय के गलियारों में चर्चा आम है कि यदि आपको किसी बड़े अधिकारी से मिलना है, तो असली बाधा अधिकारी नहीं, बल्कि उनके बाहर बैठे पीए हैं। विशेष रूप से उद्योग विभाग (Department of Industry) की स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है। सूत्रों की मानें तो प्रमुख सचिव (Principal Secretary) के पीए का रूतबा ऐसा है कि वे खुद को ही ‘प्रमुख सचिव’ मान बैठे हैं।

उद्योगपति और जनता बेहाल

प्रदेश में निवेश लाने और उद्योगों को बढ़ावा देने का दावा करने वाला यह विभाग आज लालफीताशाही का शिकार है। दूर-दराज से आए आम लोग हों या करोड़ों का निवेश करने वाले उद्योगपति, इन ‘छोटे साहबों’ की बेरुखी और अकड़ के कारण घंटों इंतजार करने के बाद भी खाली हाथ लौट जाते हैं।

• सुनवाई का अभाव: फाइलों का अंबार लगा है, लेकिन पीए की ‘हरी झंडी’ के बिना साहब तक पहुंचना नामुमकिन है।

• अहंकार की पराकाष्ठा: मंत्रालय में बैठे इन कारिंदों को न तो जनता की समस्याओं से सरोकार है और न ही प्रदेश के विकास से।

क्या ऐसे ही चलेगा ‘राज’?

सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले ये अधिकारी और उनके सहायक इसी तरह अपनी ‘हुकूमत’ चलाएंगे? मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस की नीति को वल्लभ भवन के ये चंद लोग अपनी कार्यशैली से चुनौती दे रहे हैं। यदि उद्योगपतियों और आम जनता की सुनवाई इसी तरह बंद रही, तो प्रदेश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा।

अब देखना यह है कि क्या शासन इन ‘स्वयंभू भगवानों’ की जवाबदेही तय करता है या वल्लभ भवन की इन बंद दीवारों के पीछे अहंकार का यह खेल यूं ही जारी रहेगा।

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