
भोपाल/ (ब्रांडवाणी समाचार) : मध्य प्रदेश में उद्योगों को बढ़ावा देने, निवेश लाने और रोजगार के अवसर पैदा करने की जिम्मेदारी संभाल रहे एमएसएमई विभाग की कार्यप्रणाली पर अब सवाल उठने लगे हैं। मामला सिर्फ उद्योगों को जमीन आवंटित करने में हो रही देरी तक सीमित नहीं है, बल्कि विभाग के अधीन काम करने वाले उद्यमिता विकास केंद्र, मध्य प्रदेश सेडमैप की कार्यप्रणाली भी चर्चा में है। खासकर मैनपॉवर और अन्य सेवाओं के लिए एम्पैनलमेंट प्रक्रिया की धीमी रफ्तार तथा एक एजेंसी को कथित तौर पर प्राथमिकता दिए जाने के आरोपों ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर नए एम्पैनलमेंट में इतनी सुस्ती क्यों?
उद्योग और सेवा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के मुताबिक सेडमैप में मैनपॉवर समेत विभिन्न सेवाओं के लिए नई एजेंसियों के एम्पैनलमेंट की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। दावा किया जा रहा है कि बाजार में मौजूद कई योग्य और तकनीकी रूप से सक्षम एजेंसियां अवसर का इंतजार कर रही हैं, लेकिन प्रक्रिया में तेजी नहीं आने से प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है- क्या एम्पैनलमेंट की धीमी रफ्तार महज प्रशासनिक देरी है या इसके पीछे कोई और वजह है?
अगर किसी सरकारी या सार्वजनिक संस्था में नई एजेंसियों को समान अवसर मिलता है, तो इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और बेहतर सेवा के साथ-साथ लागत में भी पारदर्शिता आती है। ऐसे में प्रक्रिया लंबी खिंचने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
‘आरबी एसोसिएट’ को लेकर क्यों गर्म है चर्चा?
पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा मैनपॉवर सप्लाई से जुड़ी एजेंसी ‘आरबी एसोसिएट’ को लेकर है। सूत्रों और कुछ संबंधित एजेंसियों की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि सेडमैप के कार्यपालन संचालक राजेंद्र सिंह के कार्यकाल में इस एजेंसी को कथित तौर पर प्राथमिकता मिल रही है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल यह है कि अगर कई एजेंसियां समान रूप से पात्र हैं तो सभी को प्रतिस्पर्धा का बराबर मौका क्यों न मिले?
यही वह बिंदु है जहां पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
तीन बड़े सवाल, जिनका जवाब जरूरी
मामले को लेकर अब कई सवाल सामने हैं-
- क्या नई एजेंसियों के एम्पैनलमेंट में हो रही देरी से किसी मौजूदा एजेंसी को अप्रत्यक्ष फायदा मिल रहा है?
- क्या मैनपॉवर सप्लाई से जुड़ी प्रक्रिया और नियमों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है?
- क्या सभी पात्र एजेंसियों को समान अवसर दिया जा रहा है?
- क्या एम्पैनलमेंट प्रक्रिया का स्वतंत्र या उच्चस्तरीय ऑडिट कराया जा सकता है?
- आखिर नई एजेंसियों को एम्पैनल करने की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आने पर ही यह साफ हो सकेगा कि मामला महज प्रशासनिक सुस्ती का है या वाकई किसी एजेंसी को फायदा पहुंचाने की स्थिति बनी है।
जमीन आवंटन की सुस्ती से निवेशकों की भी बढ़ी बेचैनी
सेडमैप से जुड़े सवालों के साथ एमएसएमई विभाग की एक और चुनौती सामने आ रही है- उद्योगों के लिए जमीन आवंटन में देरी।
सरकार लगातार मध्य प्रदेश को निवेश का बड़ा केंद्र बनाने और नए उद्योगों को आकर्षित करने की बात कर रही है। निवेशकों के लिए नीतियां और योजनाएं तैयार की जा रही हैं, लेकिन यदि जमीन आवंटन और प्रशासनिक प्रक्रियाएं ही समय पर पूरी नहीं होंगी तो निवेश जमीन पर कैसे उतरेगा?
उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि निवेशक सिर्फ घोषणाएं नहीं, बल्कि तेज और स्पष्ट प्रशासनिक कार्रवाई चाहते हैं। आवेदन से लेकर जमीन आवंटन और अन्य अनुमतियों तक प्रक्रिया जितनी आसान होगी, राज्य में निवेश का माहौल उतना ही मजबूत होगा।
अब निगाहें विभाग के उच्चाधिकारियों पर
सेडमैप जैसे संस्थान में एम्पैनलमेंट की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब गेंद एमएसएमई विभाग के उच्चाधिकारियों के पाले में है। यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो उसके नियम, पात्रता, चयन और एम्पैनलमेंट की स्थिति सार्वजनिक किए जाने से कई सवालों का जवाब अपने आप मिल सकता है।
वहीं, यदि किसी एक एजेंसी को नियमों से हटकर लाभ पहुंचाने के आरोप निराधार हैं, तो संबंधित अधिकारी और संस्था दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।
फिलहाल बड़ा सवाल यही है- सेडमैप में प्रतिस्पर्धा का रास्ता खुला है या कुछ एजेंसियों के लिए दरवाजे ज्यादा आसानी से खुल रहे हैं?
इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच या प्रक्रिया के ऑडिट से ही स्थिति साफ हो सकती है। अब देखना यह होगा कि एमएसएमई विभाग और सेडमैप इन गंभीर सवालों पर क्या जवाब देते हैं।
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