
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हालिया निर्णयों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार प्रशासनिक शिथिलता को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। पिछले एक सप्ताह के भीतर मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और कैबिनेट स्तर पर लिए गए नीतिगत फैसलों में जनता की सहूलियत और फाइलों के त्वरित निपटारे पर विशेष जोर दिया गया है।
ब्रांडवाणी समाचार की जमीनी समीक्षा के अनुसार, सरकार का मुख्य ध्यान इस समय “मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस” के सिद्धांत को धरातल पर उतारने पर है।
पिछले कुछ दिनों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें कर स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। इस निर्णय के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
फाइलों का समयबद्ध निवारण: जनहित से जुड़ी योजनाओं की फाइलें अब किसी भी टेबल पर तीन दिन से अधिक नहीं रुकेंगी। यदि कोई देरी होती है, तो संबंधित अधिकारी को लिखित में कारण स्पष्ट करना होगा।
भ्रष्टाचार और लापरवाही पर ‘जीरो टॉलरेंस’: हाल ही में मैदानी स्तर पर लापरवाही बरतने वाले कुछ अधिकारियों पर की गई त्वरित कार्रवाई यह दर्शाती है कि मुख्यमंत्री केवल निर्देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका कड़ाई से पालन भी सुनिश्चित कर रहे हैं।
जनसुनवाई को मिला नया बल: जिला स्तर पर होने वाली जनसुनवाई की मॉनिटरिंग सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय से करने का निर्णय लिया गया है, ताकि आम नागरिकों की समस्याओं का समाधान जिले में ही हो सके और उन्हें भोपाल के चक्कर न काटने पड़ें।
लोकतंत्र में सरकार की पहचान उसके विज्ञापनों से नहीं, बल्कि उसकी प्रशासनिक गति से होती है। डॉ. मोहन यादव का यह कदम यदि पूरी पारदर्शिता के साथ लागू होता है, तो इससे न केवल सरकारी योजनाओं की गति बढ़ेगी, बल्कि लालफीताशाही पर भी लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री के इस हालिया रुख से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप और कसावट दोनों देखी जा रही है। एक सजग मीडिया माध्यम के रूप में, ब्रांडवाणी समाचार इस निर्णय को मध्य प्रदेश के विकास के लिए एक सकारात्मक कदम मानता है। अब देखना यह होगा कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक अमला इन आदेशों को कितनी संजीदगी और तत्परता से लागू करता है।
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