
कर्ज की मदिरा और टैक्स का चखना; क्या गर्त में जा रहा है मध्य प्रदेश का भविष्य?
भोपाल | विशेष प्रतिनिधि
मध्य प्रदेश में ‘मुफ्त की रेवड़ियों‘ का ऐसा मायाजाल बुना गया है, जिसकी कीमत अब प्रदेश की आम जनता को अपनी जेब ढीली करके चुकानी पड़ रही है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार और पर्दे के पीछे से ‘राष्ट्रभक्ति‘ का पाठ पढ़ाने वाला संघ (RSS) क्या अब प्रदेश को कर्ज के दलदल में धकेलने का संकल्प ले चुके हैं? सवाल गहरा है, क्योंकि सरकार की ‘नाकामी‘ का बोझ अब धीरे–धीरे जनता के कंधों पर टैक्स और महंगाई के रूप में लादा जा रहा है।
आम आदमी की जेब पर ‘किश्तों‘ वाला डकैती?
सरकार की कार्यप्रणाली अब ‘उधार लेकर घी पीने‘ जैसी हो गई है। कभी आबकारी नीति में बदलाव, कभी परिवहन शुल्क में बढ़ोतरी, तो कभी राजस्व के नाम पर 10-20 रुपये की ‘साइलेंट‘ वृद्धि—ये वो तरीके हैं जिनसे जनता को पता भी नहीं चलता और उनका बजट बिगड़ जाता है।
कड़वा सच:
● कर्ज का पहाड़: प्रदेश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। हर नया जन्म लेने वाला बच्चा अब हजारों रुपये का कर्ज लेकर पैदा हो रहा है।
● अधिकारियों की ‘जुगलबंदी‘: सत्ता के गलियारों में बैठे बड़े IAS और IPS अधिकारी, जो नीति निर्धारण करते हैं, क्या वे सिर्फ अपनी ‘रोटी सेंकने‘ में मशगूल हैं? आरोप है कि ये अधिकारी ऐसी योजनाएं तैयार करते हैं जो धरातल पर कम और विज्ञापनों में ज्यादा चमकती हैं, ताकि उनके अपने पद और रसूख सुरक्षित रहें।
राष्ट्रभक्ति का ‘छद्म जाल‘ या जनता का शोषण?
RSS और भाजपा सरकार जिस राष्ट्रभक्ति के नाम पर वोट बटोरती है, क्या उसी की आड़ में जनता का आर्थिक शोषण जायज है? ‘लोक–लुभावन‘ योजनाओं के नाम पर खजाना खाली करना और फिर उस घाटे को भरने के लिए जनता पर अप्रत्यक्ष कर थोपना, क्या यही सुशासन है?
“जब योजनाएं वोट बैंक को देखकर बनाई जाती हैं, न कि आर्थिक स्थिरता को देखकर, तो भविष्य नरक जैसा ही प्रतीत होता है। आज की मुफ्त की रेवड़ी, कल की पीढ़ी के लिए कड़वा जहर साबित होगी।”
अधिकारियों और सत्ताधारियों का ‘मठ’
यह देखना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उच्च पदों पर बैठे नौकरशाह सरकार के ‘यस मैन‘ बन गए हैं। जनता के टैक्स के पैसे से ऐशो–आराम करने वाले ये अधिकारी ऐसी योजनाओं को अंजाम देते हैं, जो दिखने में ‘कल्याणकारी‘ हैं लेकिन आर्थिक रूप से ‘आत्मघाती‘। क्या यह सत्ता और प्रशासन की मिलीभगत का सबसे वीभत्स रूप है?
जनता की जागृति: क्या अब बदलाव आएगा?
अब सवाल जनता की अदालत में है। क्या मध्य प्रदेश की जनता इन बहकावों को समझ चुकी है? सोशल मीडिया और सड़क पर उठती आवाजें संकेत दे रही हैं कि लोग अब समझ रहे हैं कि उनका भविष्य ‘नर्क‘ की ओर धकेला जा रहा है। राष्ट्रभक्ति के नाम पर भावनाओं से खेलना और पीछे से आर्थिक बोझ लादना, अब यह खेल ज्यादा दिन नहीं चलेगा।
सरकार को यह समझना होगा कि खजाना जनता की अमानत है, किसी दल की जागीर नहीं। यदि कर्ज लेकर और टैक्स बढ़ाकर ही सरकार चलानी है, तो उन भारी–भरकम वेतन पाने वाले ‘विशेषज्ञों‘ और IAS अधिकारियों की क्या जरूरत है? प्रदेश को ‘बिकाऊ‘ नहीं, ‘टिकाऊ‘ नीतियों की आवश्यकता है।







