
गुना/ मोहित सोनी: मध्य प्रदेश में एक ओर पुलिस और प्रशासन द्वारा “नशे से दूरी है जरूरी” और “नशामुक्त मध्य प्रदेश” जैसे अभियानों के जरिए लोगों, खासकर युवाओं को नशे से दूर रहने का संदेश दिया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर नशीले पदार्थों की बिक्री के लिए सरकारी लाइसेंस और अनुमति दिए जाने को लेकर अब आम जनता में सवाल उठने लगे हैं।
अभियान और सरकारी लाइसेंस के बीच विरोधाभास
पुलिस और प्रशासन की ओर से स्कूल कॉलेजों, सार्वजनिक स्थानों और विभिन्न आयोजनों के माध्यम से नशे के दुष्परिणामों को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। रैलियों और कार्यक्रमों में युवाओं से नशे से दूर रहने की अपील की जा रही है।
लेकिन इसी बीच लोगों का सवाल है कि जब नशे के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है, तो नशीले पदार्थों की बिक्री के लिए सरकारी लाइसेंस और अनुमति आखिर क्यों दी जाती है? यही विरोधाभास अब चर्चा का विषय बन गया है।
जनता पूछ रही है राजस्व बड़ा या युवाओं का भविष्य?
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आम नागरिकों का सवाल है कि क्या नशामुक्ति अभियान केवल जागरूकता रैलियों, पोस्टरों और नारों तक सीमित रह जाएगा? लोगों का कहना है कि एक ओर युवाओं को नशे से दूर रहने की सलाह दी जाती है, वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा लाइसेंस के माध्यम से कुछ नशीले पदार्थों की बिक्री को अनुमति दी जाती है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है राजस्व अर्जित करना या युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करना?
सिर्फ रैलियों से कैसे खत्म होगा नशा?
लोगों का कहना है कि नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान जरूरी हैं, लेकिन केवल रैलियां और शपथ कार्यक्रम पर्याप्त नहीं होंगे। जब तक नशीले पदार्थों की उपलब्धता, अवैध कारोबार और युवाओं तक उनकी पहुंच पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया जाता, तब तक नशामुक्ति अभियान की सफलता पर सवाल उठते रहेंगे।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन नशे के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों के साथ साथ नशीले पदार्थों की उपलब्धता को नियंत्रित करने के लिए भी ठोस कदम उठाएगा, या फिर “नशे से दूरी है जरूरी” का संदेश केवल जागरूकता कार्यक्रमों तक ही सीमित रहेगा?
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