मध्य प्रदेश सरकार में भारी असंतोष, कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का मुख्यमंत्री को तीखा पत्र, व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल?

“पिछले ढाई वर्षों से सिर्फ असहयोग, उपेक्षा और विरोध ही मिल रहा” – विजयवर्गीय के इस प्रहार से मध्य प्रदेश की सियासत में भूचाल, प्रशासनिक व्यवस्था से गहराया असंतोष।

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने शासन और संगठन की स्थिरता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। प्रदेश सरकार के कद्दावर और वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक अत्यंत तीखा और स्पष्ट पत्र लिखकर शासन व्यवस्था के प्रति अपना गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। इस पत्र के सामने आने के बाद यह साफ हो गया है कि मध्य प्रदेश सरकार के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और प्रशासनिक तंत्र तथा राजनैतिक नेतृत्व के बीच गहरे मतभेद और भारी असंतोष व्याप्त है।

ब्रांडवाणी समाचार को मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में अत्यंत गंभीर और सीधे आरोप लगाए हैं। विजयवर्गीय ने साफ शब्दों में कहा है, *”प्रदेश के मुखिया और मेरे गृह जिले के प्रभारी मंत्री होने के नाते मुझे आपसे सहयोग की अपेक्षा थी, परंतु पिछले ढाई वर्षों में मुझे सिर्फ असहयोग, उपेक्षा और विरोध ही मिल रहा है।” उन्होंने आगे चेतावनी भरे लहजे में लिखा है कि यदि इन गंभीर विषयों का समय पर निराकरण नहीं किया गया, तो वे इंदौर की जनता की आवाज को सार्वजनिक मंच पर उठाने के लिए विवश होंगे।

यह पत्र केवल एक सामान्य राजनैतिक शिकायत नहीं है, बल्कि इसमें मध्य प्रदेश के सबसे प्रमुख औद्योगिक केंद्र इंदौर की विकास परियोजनाओं को जानबूझकर बाधित करने के पांच बेहद गंभीर और विशिष्ट बिंदु उठाए गए हैं। इस पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से ही मंत्रालय से लेकर राजनैतिक गलियारों तक हड़कंप मच गया है।

कैलाश विजयवर्गीय द्वारा उठाए गए 5 प्रमुख उपेक्षा के बिंदु:

  1. मास्टर प्लान में जानबूझकर देरी: इंदौर का मास्टर प्लान जो दो वर्ष पूर्व ही मुख्यमंत्री कार्यालय भेजा जा चुका है, उसे विभागीय और प्रशासनिक स्तर पर अब तक लंबित रखा गया है।
  2. मेट्रोपॉलिटन रीजन में इंदौर की उपेक्षा: प्रदेश का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र होने के बावजूद इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन रीजन में इंदौर का नाम पीछे धकेल दिया गया है, जबकि रीजन में इंदौर का हिस्सा 59% है।
  3. आरजीपीवी (RGPV) के विभाजन में अनदेखी: राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को तीन भागों में बांटने के प्रस्ताव में भोपाल, उज्जैन और जबलपुर को प्राथमिकता दी गई, जबकि इंदौर के ऐतिहासिक संस्थान SGSITS की घोर उपेक्षा की गई।
  4. इंदौर-पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र की अनदेखी: पीथमपुर में 650 से अधिक MSME और 170 से अधिक बड़े कारखाने होने के बाद भी राष्ट्रीय स्तर की टेस्टिंग लैब और सर्टिफिकेशन सेंटर लाने की फाइल लंबे समय से धूल फांक रही है।
  5. एयरपोर्ट विस्तार और विकास कार्यों में अड़ंगे: इंदौर एयरपोर्ट के विस्तार के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराने और सिंहस्थ के कार्यों में इंदौर की लगातार अनदेखी की जा रही है, जिससे जल संकट जैसी मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।

इस पूरे मामले पर जब सरकार और पार्टी संगठन का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो भाजपा के आंतरिक हलकों में सन्नाटा पसरा दिखाई दिया। मुख्यमंत्री कार्यालय और पार्टी प्रवक्ताओं ने इस विषय पर कुछ भी खुलकर बोलने से परहेज किया है। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर इस पत्र को अत्यंत गंभीरता से लिया जा रहा है और इसे “आंतरिक विषय” बताकर डैमेज कंट्रोल की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं।

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि कैलाश विजयवर्गीय जैसे कद्दावर नेता का यह कदम केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की वर्तमान सत्ता संरचना के खिलाफ एक बड़ा राजनैतिक विस्फोट है। यह पत्र दर्शाता है कि प्रदेश का प्रशासनिक अमला और शीर्ष नेतृत्व जमीनी नेताओं और मंत्रियों के सुझावों को दरकिनार कर रहा है, जिससे समूचे सिस्टम में भारी असंतोष गहरा गया है। यदि समय रहते मुख्यमंत्री द्वारा इस असंतोष को शांत नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा फेरबदल या आंतरिक संकट देखने को मिल सकता है।

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