एमपी की ‘इकनॉमी’ वेंटिलेटर पर: कर्ज का ‘नशा’ और टैक्स का ‘चाबुक’, क्या मोहन राज में गिरवी रखा जा रहा है प्रदेश का भविष्य?

मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक अजीब सा विरोधाभास तैर रहा है। एक तरफ राम-राज्यऔर विकसित प्रदेशके बड़े-बड़े होर्डिंग्स चमक रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकारी खजाने की खोखली होती दीवारों की गूँज सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार जिस रफ्तार से कर्ज ले रही है, उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रदेश अब उधार के घीसे अपनी साख को चमकाने की नाकाम कोशिश कर रहा है?

मुफ्त की रेवड़ीका ज़हरीला स्वाद

वोट बैंक की राजनीति ने प्रदेश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ योजनाएं जनता के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के औजार के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं। लाड़ली बहना से लेकर अन्य लोकलुभावन घोषणाओं का बोझ अब आम आदमी की कमर तोड़ रहा है। सरकार एक हाथ से रेवड़ीबाँट रही है और दूसरे हाथ से टैक्स, स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्री शुल्क के जरिए जनता की जेब पर सर्जिकल स्ट्राइककर रही है।

नौकरशाही का सर्कसऔर बेबस जनता

सत्ता के गलियारों में बैठे सफेद हाथीयानी बड़े IAS अधिकारी, जो फाइलों पर विकास की इबारत लिखते हैं, आखिर वे प्रदेश को इस आर्थिक दलदल से निकालने में विफल क्यों हैं? आरोप लग रहे हैं कि ये अधिकारी केवल सत्ताधीशों की जी-हज़ूरीमें मशगूल हैं ताकि उनके मलाईदार पद सुरक्षित रहें। जब नीतियां आर्थिक विशेषज्ञों के बजाय इवेंट मैनेजमेंटके आधार पर बनती हैं, तो परिणाम वही होता है जो आज मध्य प्रदेश झेल रहा है—रिकॉर्ड तोड़ कर्ज।

राष्ट्रभक्ति की आड़ में आर्थिक अन्याय‘?

RSS की विचारधारा और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने वाली भाजपा सरकार से जनता यह पूछ रही है कि क्या आने वाली पीढ़ी के कंधों पर कर्ज का बोझ लादना ही असली राष्ट्रभक्तिहै? हर नया जन्म लेने वाला बच्चा अब मध्य प्रदेश में हजारों रुपये का कर्जदार होकर पैदा हो रहा है। क्या यह वही सुशासन है जिसका वादा किया गया था?

  • Gaurav Singh

    Gaurav Singh

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