
सूत्रों के अनुसार, अपनी सेवा के अंतिम दौर में साहब की सबसे बड़ी ख्वाहिश सूबे का ‘पुलिस कप्तान’ (DGP या प्रमुख पद) बनने की थी। इस पद को पाने के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सब आजमा लिए। चर्चा तो यहां तक है कि चयन पैनल में शामिल अपने ही साथी अफसरों की शिकायत करने से भी वे नहीं चूके। जब बात नहीं बनी, तो अंतिम दांव के रूप में ‘ओबीसी कार्ड’ (OBC Card) भी खेला गया, लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और वे बिना कप्तान बने ही सेवामुक्त हो गए।
रिटायरमेंट के बाद भी नहीं थमी ‘दौड़’
कहा जाता है कि सरकारी पद का नशा उतरना मुश्किल होता है। रिटायरमेंट के ठीक बाद साहब ने ‘मानव अधिकार आयोग’ के अध्यक्ष पद पर नजरें गड़ाईं। अफसरशाही के गलियारों में उनकी इस भागदौड़ और लॉबिंग की खूब चर्चा रही। सत्ता के शीर्ष तक पहुंच बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद वहां भी उन्हें खाली हाथ ही रहना पड़ा।
अब ‘सूचना आयोग’ पर टिकी निगाहें
हाल ही में जैसे ही यह खबर गलियारों में तैरी कि ‘सूचना आयोग’ में सदस्यों की नियुक्तियां होने वाली हैं, साहब एक बार फिर एक्टिव मोड में आ गए हैं।
- पुराने संपर्क साधने शुरू: साहब ने अपने पुराने राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्कों को फिर से खंगालना शुरू कर दिया है।
- लॉबिंग तेज: बताया जा रहा है कि फाइल आगे बढ़वाने के लिए वे फिर से वही पुराने हथकंडे अपना रहे हैं जो उन्होंने पुलिस कप्तान बनने के समय अपनाए थे।
सियासी गलियारों का सवाल: “आखिर क्या वजह है कि रिटायरमेंट के सुकून के बजाय साहब को सत्ता की मलाई और कुर्सी का मोह चैन से बैठने नहीं दे रहा?”
अब देखना दिलचस्प होगा कि दो बार मात खाने के बाद, क्या इस बार ‘सूचना आयोग’ में साहब की मुराद पूरी होती है या फिर नियति उन्हें एक बार फिर निराश करेगी।







