एमपी का ‘सुपर बॉस’ कौन? वल्लभ भवन के गलियारों में छिड़ा ‘कुर्सी युद्ध’!

मध्य प्रदेश की प्रशासनिक बिसात पर इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदेश का अगला मुख्य सचिव  कौन होगा? क्या अनुराग जैन को एक बार फिर सेवा विस्तार  मिलेगा, या फिर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पसंद का कोई नया चेहरा ‘वल्लभ भवन’ की कमान संभालेगा?

सत्ता के गलियारों में चार बड़े नाम और सियासी गुणा-भाग

प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में इस समय चार चेहरों को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। हर नाम के पीछे अपनी एक ठोस वजह और दिल्ली से लेकर भोपाल तक की लॉबिंग छिपी है:

  1. अनुराग जैन (1989 बैच): वर्तमान मुख्य सचिव। इनका कार्यकाल पहले ही बढ़ाया जा चुका है (अगस्त 2026 तक)। सवाल यह है कि क्या दिल्ली का ‘हाईकमान’ उन पर अपना भरोसा बरकरार रखते हुए आगे भी सेवा विस्तार देगा? वे दिल्ली और भोपाल के बीच एक मजबूत कड़ी माने जाते हैं।

 

    2. डॉ. राजेश राजोरा (1990 बैच): मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव (ACS) और भरोसेमंद अफसर। राजोरा को डॉ. मोहन यादव की ‘कोर टीम’ का हिस्सा माना जाता है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि अगर ‘लोकल चॉइस’ चली, तो राजोरा की दावेदारी सबसे ऊपर होगी।

 

     3.नीरज मंडलोई (1993 बैच): एक साफ-सुथरी छवि और प्रशासनिक पकड़ वाले अफसर। इनका नाम तब उछलता है जब बात ‘न्यूट्रल’ और ‘परफॉर्मेंस ओरिएंटेड’ चुनाव की आती है।

 

      4.  अशोक वर्णवाल (1991 बैच): सीनियरिटी और अनुभव के मामले में वर्णवाल का पलड़ा भारी है। वे भी रेस में मजबूती से बने हुए हैं।

फैसला किसका: मोहन यादव या दिल्ली हाईकमान?

सबसे बड़ा सस्पेंस इस बात पर है कि आखिर इस ‘हॉट सीट’ का फैसला होगा कहाँ?

  • भोपाल की मंशा: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव चाहते हैं कि सीएस ऐसा हो जो उनके विजन और उनकी कार्यशैली से पूरी तरह मेल खाता हो।

 

  • दिल्ली का दखल: मध्य प्रदेश की राजनीति में अब दिल्ली ‘हाईकमान’ की भूमिका निर्णायक हो चुकी है। अनुराग जैन जैसे अफसरों की नियुक्ति में केंद्र की पसंद सर्वोपरि रही है।

वल्लभ भवन की पांचवीं मंजिल पर सन्नाटा है, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज है। देखना होगा कि समय का ऊंट किस करवट बैठता है और दिल्ली की मुहर किसके नाम पर लगती है।

बड़ा सवाल: क्या बदलेगी प्रदेश की प्रशासनिक तासीर?

मुख्य सचिव केवल एक पद नहीं, बल्कि सरकार का चेहरा होता है। यदि राजेश राजोरा को कमान मिलती है, तो इसे मुख्यमंत्री की बड़ी जीत माना जाएगा। वहीं, यदि अनुराग जैन का कार्यकाल और प्रभावी रहता है, तो यह केंद्र के नियंत्रण का संकेत होगा।

5 दिन की ‘प्रभारी’ व्यवस्था हो या परमानेंट नियुक्ति, एमपी की ब्यूरोक्रेसी में आने वाले कुछ दिन बड़े बदलावों के संकेत दे रहे हैं।

  • gaurav singh rajput

    gaurav singh rajput

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