
एक बड़े और संवेदनशील जिले में पदस्थ सीधे भर्ती वाले एसपी साहब इन दिनों अपनी खास कार्यशैली को लेकर सुर्खियों में हैं। सूत्रों के मुताबिक, जिले के कुछ जनप्रतिनिधि साहब से इतने परेशान बताए जा रहे हैं कि मामला शिकायत तक पहुंच गया है। चर्चा है कि साहब का ऑफिस आम-जन के लिए ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के लिए भी आसानी से उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि फोन करने पर भी फोन नहीं उठने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब जनप्रतिनिधि ही अपनी समस्याओं को लेकर एसपी तक आसानी से नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो आम जनता की स्थिति क्या होगी।
बताया जाता है कि साहब का ऑफिस अपने ही हिसाब से चलता है और यह तय करना भी मुश्किल होता है कि साहब से कब मुलाकात हो पाएगी। ऊपर से कार्यालय के बाहर लगा एक बोर्ड इन दिनों खास चर्चा में है, जिस पर लिखा है—‘अनाधिकृत प्रवेश पूर्णतः वर्जित’। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर अधिकृत और अनाधिकृत व्यक्ति कौन है, यह तय कौन करता है और इसका फैसला भी साहब ही करते हैं क्या? ऐसे में जनप्रतिनिधियों को एंट्री का स्टेटस क्या है, यह समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है। सूत्रों की मानें तो कुछ जनप्रतिनिधियों की एक और शिकायत है कि साहब उनके मोबाइल तक रिसीव नहीं करते। यानी जनता की समस्या लेकर पहुंचने पर पहले साहब से मिलने की अनुमति चाहिए और फोन करने पर फोन उठे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं।
इसी बीच जिले में हुई कुछ बड़ी चोरियों का खुलासा लंबे समय बाद भी नहीं होने से पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन मामलों को लेकर भी चर्चा चल रही है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। इसी बीच शाम होते-होते साहब के पार्टी मोड में चले जाने की चर्चा भी गलियारों में तेज रहती है। पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जनप्रतिनिधियों और पुलिस प्रशासन के बीच संवाद कितना सहज है और जनता से जुड़े मामलों को लेकर अधिकारियों तक पहुंच किस तरह सुनिश्चित की जा रही है। फिलहाल एसपी साहब की कार्यशैली, ऑफिस में प्रवेश और फोन नहीं उठाने की चर्चाएं जिले के प्रशासनिक एवं राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
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