
उच्च शिक्षा विभाग में ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की खुली धज्जियाँ: जाँच के आदेश के बावजूद जीवाजी यूनिवर्सिटी में दोबारा पैर जमाने की जुगत में विवादित पूर्व रजिस्ट्रार सुशील मंडेरिया।
भोपाल / ग्वालियर (ब्रांडवाणी समाचार)। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार एक तरफ भ्रष्टाचार पर ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का ढिंढोरा पीटती है, तो दूसरी तरफ रसूखदार और गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारियों पर मेहरबानी की सारी हदें पार कर दी जाती हैं। ताज़ा और सबसे सनसनीखेज मामला उच्च शिक्षा विभाग से जुड़ा है, जहाँ मध्य प्रदेश भोज (ओपन) विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार सुशील मंडेरिया (वर्तमान में जीवाजी यूनिवर्सिटी में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ) के खिलाफ भ्रष्टाचार का पहाड़ खड़ा होने के बावजूद शासन-प्रशासन धृतराष्ट्र बना बैठा है।
आखिर लोकायुक्त की प्रारंभिक जाँच और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (CM Helpline) पर पुख्ता साक्ष्यों के साथ दर्ज शिकायतों के बाद भी इस दागी अधिकारी पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? अप्पर मुख्य सचिव (ACS) अनुपम राजन और उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार की जोड़ी इस महाभ्रष्ट तंत्र पर जाँच बैठाने से क्यों कतरा रही है? यह आज उच्च शिक्षा जगत का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
‘ब्रांडवाणी समाचार’ के हाथ लगे पुख्ता दस्तावेज़ों (CM Helpline शिकायत क्रमांक: 38431811) के मुताबिक, भोज मुक्त विश्वविद्यालय के कार्यकाल के दौरान सुशील मंडेरिया पर पद का दुरुपयोग कर निजी लाभ कमाने, नियमों के विरुद्ध ठेके बांटने, अवैध भर्तियाँ करने और सरकारी धन के भारी दुरुपयोग के गंभीर आरोप हैं ।
शिकायतकर्ता राजीव शर्मा (मेरठ) द्वारा दर्ज कराई गई इस आधिकारिक शिकायत में साफ़ तौर पर उल्लेख है कि मंडेरिया ने:
* पद का दुरुपयोग कर निरंकुश होकर वित्तीय अनियमितताएं कीं ।
* नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को ठेके और भुगतान बांटे ।
* प्रशासनिक पारदर्शिता और सेवा नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ाईं ।
* व्यापारियों के साथ अमानवीय व्यवहार, मानसिक उत्पीड़न और डरा-धमकाकर अवैध उगाही को अंजाम दिया ।
हैरानी की बात यह है कि 20 मई 2026 को दर्ज इस शिकायत पर अधिकारी महज़ “कार्यवाही जारी है” और “प्रकरण संबंधित शाखा को प्रेषित” का खेल खेलकर फाइलों को दबाए बैठे हैं ।
सूत्रों के मुताबिक, सुशील मंडेरिया के खिलाफ लोकायुक्त संगठन ने भी गंभीर वित्तीय गड़बड़ियों को देखते हुए जाँच के निर्देश दिए हैं। नियम कहते हैं कि जिस अधिकारी पर लोकायुक्त की तलवार लटकी हो, उसे लूप लाइन में भेजा जाना चाहिए। लेकिन यहाँ गंगा उल्टी बह रही है! मंडेरिया को पर्यावरण विभाग की अत्यंत महत्वपूर्ण विनियामक संस्था ‘सिया’ (SEIAA – State Level Environment Impact Assessment Authority) में मेंबर बनाकर बैठा दिया गया।
चर्चाएँ तो यहाँ तक हैं कि यह महाशय अब फिर से ग्वालियर की जीवाजी यूनिवर्सिटी में रजिस्ट्रार (कुलसचिव) की मलाईदार कुर्सी पर काबिज होने के लिए मंत्रालय से लेकर बड़े रसूखदारों के चक्कर काट रहे हैं और इसके लिए तगड़ी सेटिंग की जा रही है।
‘ब्रांडवाणी’ के तीखे सवाल: जवाब दे सरकार…
1. मुख्यमंत्री जी, कहाँ गई ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति? जब लोकायुक्त और सीएम हेल्पलाइन में साक्ष्यों के साथ शिकायतें मौजूद हैं, तो मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) इस विवादित अधिकारी पर इतना मेहरबान क्यों है?
2. ACS अनुपम राजन और मंत्री इंदर सिंह परमार क्यों मौन हैं? उच्च शिक्षा विभाग के मुखिया और प्रशासनिक विंग के सबसे बड़े अधिकारी आखिर किसके दबाव में मंडेरिया के खिलाफ बड़ी विभागीय जाँच शुरू करने से बच रहे हैं?
3. दागी को मलाईदार पद क्यों? एक तरफ बेदाग अधिकारियों को किनारे किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर आरोपों से घिरे व्यक्ति को लगातार महत्वपूर्ण पदस्थापनाओं से क्यों नवाजा जा रहा है?
सुशील मंडेरिया जैसे अधिकारियों का लगातार मलाईदार पदों पर बने रहना यह साबित करता है कि उच्च शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं और इन्हें ऊपर बैठे सफेदपोशों और बड़े नौकरशाहों का खुला संरक्षण प्राप्त है। ‘ब्रांडवाणी समाचार’ इस पूरे मामले की कड़ियों को बेनकाब करता रहेगा। देखना यह है कि इस खबर के बाद सोई हुई सरकार जागती है या फिर भ्रष्टाचार की इस ‘मंडेरिया गाथा’ को दबाने का प्रयास किया जाता है।
- why-is-government-silent-on-sunil-manderia-despite-lokayukta-and-cm-helpline-complaints









