
मध्य प्रदेश कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने जिस उर्वरक सुधार और प्रत्यक्ष नकद सहायता मॉडल की सिफारिश की है, वह राज्य के लिए अब केवल विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन गया है। बढ़ती यूरिया खपत, बिगड़ता मिट्टी स्वास्थ्य और सब्सिडी का भारी बोझ — इन तीनों चुनौतियों का समाधान अब ‘Zero Cost to Farmer’ मॉडल और PM-PRANAM योजना के जरिए ही संभव दिख रहा है।
मध्य प्रदेश में सालाना लगभग 34 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खपत होती है, जिस पर ₹11,800 करोड़ से अधिक की सब्सिडी खर्च होती है। बावजूद इसके नाइट्रोजन उपयोग दक्षता केवल 30–40 प्रतिशत तक सीमित है, और शेष उर्वरक मिट्टी, जल और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण ने चेतावनी दी है कि NPK अनुपात देश में 4.3:2:1 से बिगड़कर 10.9:4.1:1 हो गया है, और मध्य प्रदेश की गेहूं-धान और गन्ना बेल्ट इसका सीधा असर महसूस कर रही है।
Zero Cost to Farmer मॉडल किसानों के लिए बिलकुल मुफ्त खेती का विकल्प लेकर आता है। इस योजना के तहत किसान को न तो नैनो यूरिया के लिए भुगतान करना होगा और न ही ड्रोन छिड़काव के लिए। नमो ड्रोन दीदी योजना के अंतर्गत प्रशिक्षित ग्रामीण महिलाएं ड्रोन से नैनो यूरिया छिड़केंगी, जिससे:
उर्वरक सीधे खेत तक पहुंचेगा,
फसल उत्पादकता में 3–8% सुधार संभव होगा,
ग्रामीण महिलाओं को स्थायी रोजगार मिलेगा।
राज्य सरकार इस पूरी व्यवस्था को उर्वरक सब्सिडी में होने वाली बचत और PM-PRANAM के तहत मिलने वाली केंद्रीय ग्रांट से वित्तपोषित कर सकती है। अगर केवल 10% यूरिया खपत नैनो यूरिया से प्रतिस्थापित होती है, तो सालाना ₹1,670 करोड़ से अधिक की बचत और ₹500 करोड़ से अधिक की केंद्रीय सहायता के साथ राज्य को कुल ₹950 करोड़ का प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ मिल सकता है।
यह मॉडल किसानों, मिट्टी और सरकार तीनों के लिए फायदेमंद साबित होगा। किसानों को मुफ्त खेती का लाभ मिलेगा, मिट्टी और जल संसाधनों की सुरक्षा होगी, और सरकार को परिणाम आधारित प्रशासन का रास्ता मिलेगा। आर्थिक सर्वेक्षण ने जिस दिशा में कदम बढ़ाने का सुझाव दिया है, मध्य प्रदेश उसे जमीन पर लागू कर देश के लिए मॉडल स्टेट बन सकता है।







