MP में ‘सिस्टम’ का दीमक: क्या टेंडर सेटिंग और दलाली के जाल में फंसकर दम तोड़ रहा है मध्य प्रदेश का विकास?

नमस्कार, आज हम बात करेंगे उस प्रदेश की जिसे ‘देश का दिल‘ कहा जाता है, लेकिन क्या इस दिल की धड़कनें अब भ्रष्टाचार और लालफीताशाही की वजह से धीमी पड़ रही हैं? मध्य प्रदेश में इन दिनों एक नई चर्चा जोरों पर है—क्या यहाँ काम करना नामुमकिन हो गया है? क्या यहाँ टेंडर प्रक्रिया केवल एक दिखावा है और असल खेल ‘सेटिंग‘ का है?”

1. टेंडर सेटिंग: पारदर्शिता पर बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश के गलियारों में यह बात आम हो चुकी है कि सरकारी टेंडर अब योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि ‘पहचान‘ और ‘सेटिंग‘ के आधार पर तय होते हैं। जब टेंडर की शर्तें ही किसी खास व्यक्ति या कंपनी को ध्यान में रखकर बनाई जाने लगें, तो ईमानदार और काबिल ठेकेदार सिस्टम से बाहर हो जाते हैं।

2. अधिकारी, दलाल और साठगांठ का त्रिकोण

सबसे गंभीर आरोप प्रदेश की नौकरशाही पर लग रहे हैं। चर्चा है कि कई विभागों के आला अधिकारी सीधे काम करने के बजाय अपने खास ‘दलालों‘ (Middlemen) के जरिए डील करते हैं। यह ‘नेक्सस‘ इतना मजबूत हो चुका है कि बिना कमीशन और बिना सेटिंग के किसी फाइल का आगे बढ़ना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

3. विजनरी सोच की बलि और रुकता विकास

जब भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान ‘विजन‘ का होता है। प्रदेश में कई ऐसे युवा उद्यमी और विजनरी लोग हैं जो मध्य प्रदेश को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं, लेकिन सिस्टम की सड़ांध उन्हें हतोत्साहित कर रही है। परिणाम स्वरूप:

  • घटिया निर्माण कार्य (सड़कें, पुल, भवन)।
  • विकास योजनाओं में देरी।
  • प्रतिभाओं का प्रदेश से पलायन।

“विशेषज्ञों का मानना है कि जब नेता और अधिकारी इस ‘दलाली‘ के तंत्र में गहरे उतर जाते हैं, तो ‘जवाबदेही‘ (Accountability) खत्म हो जाती है। विकास केवल कागजों पर चमकता है, जबकि धरातल पर स्थितियां जस की तस बनी रहती हैं। क्या मुख्यमंत्री की ‘जीरो टॉलरेंस‘ नीति केवल बयानों तक सीमित है? या फिर इस सिस्टम को साफ करने के लिए कोई बड़ा कदम उठाया जाएगा?” मध्य प्रदेश को अगर आत्मनिर्भर और अग्रणी बनाना है, तो इस ‘दलाल-तंत्र‘ को तोड़ना ही होगा। वरना, विजनरी लोग हाशिए पर रहेंगे और प्रदेश का विकास चंद लोगों की तिजोरियों में बंद होकर रह जाएगा।

 

  • gaurav singh rajput

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