
इंदौर/भोपाल: मध्य प्रदेश की ‘मिनी मुंबई‘ कहे जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के तांडव ने कई घरों के चिराग बुझा दिए। मासूमों और निर्दोष नागरिकों की जान चली गई, पूरा प्रदेश स्तब्ध है, लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि प्रदेश के संवैधानिक मुखिया, राज्यपाल महोदय के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। क्या राजभवन अब केवल ‘फोटो अपॉर्चुनिटी‘ और वीआईपी मुलाकातों का केंद्र बनकर रह गया है?
जनता का दर्द या सिर्फ प्रोटोकॉल की चमक?
इंदौर में हुई इन मौतों ने प्रशासन की पोल खोल दी है। जहां एक तरफ गरीब बस्तियों में लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं और दम तोड़ रहे हैं, वहीं राजभवन की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
● दिखावे का पद: क्या राज्यपाल का पद केवल औपचारिक कार्यक्रमों और बड़े लोगों को अपॉइंटमेंट देने तक सीमित है?
● संवेदनशीलता का अभाव: जब जनता बूंद–बूंद साफ पानी के लिए तरस रही है और मौत के आगोश में जा रही है, तब महामहिम की ओर से एक शोक संवेदना या सख्त निर्देश न आना निंदनीय है।
● समाज सेवा या मीडिया इवेंट: राजभवन आज एक ‘समाज सेवा हाउस‘ कम और ‘मीडिया इवेंट हाउस‘ ज्यादा नजर आता है, जहां केवल रसूखदारों की ही सुनवाई होती है।
भागीरथपुरा की चीखें राजभवन तक क्यों नहीं पहुँचती?
स्थानीय निवासियों का आक्रोश चरम पर है। लोगों का कहना है कि जब चुनाव आते हैं तो बड़े–बड़े नेता और अधिकारी घर तक आते हैं, लेकिन जब दूषित पानी से मौतें हो रही हैं, तो कोई सुध लेने वाला नहीं है। राज्यपाल, जो राज्य के रक्षक माने जाते हैं, उनकी इस मामले पर चुप्पी उनकी कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
राजभवन की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
यह आरोप लग रहे हैं कि राज्यपाल हाउस में अपॉइंटमेंट केवल उन लोगों को मिलता है जिनसे सत्ता या रसूख का लाभ हो। क्या आम जनता की जान की कीमत राजभवन के भारी–भरकम प्रोटोकॉल से कम है? इंदौर की इस त्रासदी पर राज्यपाल की कोई प्रतिक्रिया न आना न केवल दुखद है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान भी है।
यदि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे, तो लोकतंत्र केवल किताबी बनकर रह जाएगा। इंदौर जल त्रासदी के दोषियों पर कार्रवाई के साथ–साथ, राजभवन को भी अपनी अंतरात्मा को झकझोरने की जरूरत है।


Aise hi likhate rahiye Satya hamesha aage badhta hai aur in nakali choro ki sachhai khulti rahti hai