इंदौर की प्रगति पर ‘नौकरशाही’ का ग्रहण: जनसेवक पुष्यमित्र भार्गव के संकल्पों को छल रही प्रशासनिक तानाशाही

इंदौर। स्वच्छता में सात आसमान छूने वाला इंदौर आज एक अजीब द्वंद्व से गुजर रहा है। एक तरफ शहर के प्रथम नागरिक, उच्च शिक्षित और दूरदर्शी महापौर पुष्यमित्र भार्गव हैं, जो इंदौर को देश की ‘शान‘ बनाने के लिए दिन–रात पसीना बहा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, शासन के गलियारों में बैठे कुछ निरंकुश अधिकारी और ‘सिस्टम‘ की जड़ता है, जो जनसेवा के पहियों को रोकने का कुत्सित प्रयास कर रही है।

महापौर का विजन बनाम अधिकारियों की मनमानी

महापौर पुष्यमित्र भार्गव केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक गंभीर विचारक हैं। उनकी कार्यप्रणाली में इंदौर को वैश्विक पटल पर स्थापित करने की छटपटाहट साफ दिखाई देती है। किंतु, धरातल पर स्थिति भयावह है। शासन के अधिकारी न केवल जनप्रतिनिधियों की अनदेखी कर रहे हैं, बल्कि उनकी कार्यशैली में एक विशेष प्रकार की ‘मानसिक तानाशाही‘ घर कर गई है। यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या जनता की सेवा में समर्पित एक जुझारू नेता के हाथ बांधने के लिए इन अधिकारियों को ‘ऊपर‘ से मौन सहमति प्राप्त है?

जनता से दुर्व्यवहार: अहंकारी तंत्र की पराकाष्ठा

इंदौर की जनता, जो इस शहर की असली ताकत है, आज इन अधिकारियों की बेरुखी का शिकार हो रही है। शिकायत लेकर पहुंचे आम नागरिकों से सीधे मुंह बात न करना और उनकी समस्याओं को कूड़ेदान में डाल देना, इन अधिकारियों की नियति बन चुकी है। जब शहर के महापौर जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को ये अधिकारी चुनौती दे रहे हैं, तो आम जनता की बिसात ही क्या है? यह केवल काम न करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का अपमान है। 

क्या इंदौर की ‘उभरती सांसों‘ का गला घोंटा जा रहा है?

इंदौर आज देश की आर्थिक और सांस्कृतिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक और काम न करने की ‘बीमारी‘ से ग्रस्त प्रशासनिक अधिकारी इस गति को अवरुद्ध कर रहे हैं। यदि शासन ने समय रहते इन ‘सिस्टम के खलनायकों‘ पर नकेल नहीं कसी, तो इंदौर के विकास का जो स्वप्न महापौर भार्गव देख रहे हैं, वह फाइलों में दबकर दम तोड़ देगा।

“सवाल यह नहीं कि अधिकारी क्या कर रहे हैं, सवाल यह है कि वे किसके शह पर एक कर्मठ महापौर को काम करने से रोक रहे हैं? क्या इंदौर की प्रगति को रोकना किसी गहरी साजिश का हिस्सा है?” 

अब जागने का समय है

इंदौर की जनता देख रही है कि कैसे उनके चहेते नेता के संकल्पों को प्रशासनिक हठधर्मिता की बलि चढ़ाया जा रहा है। पुष्यमित्र भार्गव इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं, लेकिन सिस्टम की इस ‘खलनायकी‘ का अंत होना अनिवार्य है। यदि अधिकारी अपनी मनमानी से बाज नहीं आए, तो जन–आक्रोश का यह ज्वालामुखी इस तानाशाही तंत्र को भस्म करने की शक्ति रखता है।

  • gaurav singh rajput

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