
आज बात मध्य प्रदेश के उस ‘अन्नदाता’ की, जो एक तरफ तो देश का पेट भर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ मिट्टी की गिरती सेहत और खाद की बढ़ती लागत के दोहरे बोझ तले दबा है। मध्य प्रदेश में खेती की सूरत बदलने के लिए जीरो कॉस्ट फार्मिंग का एक ऐसा मॉडल सामने आया है जो न केवल किसानों को मुफ्त खेती का अनुभव कराएगा, बल्कि राज्य सरकार की तिजोरी पर पड़े ₹11,800 करोड़ की सब्सिडी का भार भी हल्का कर सकता है ।
लेकिन सवाल बड़ा है— क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के अधिकारी इस क्रांतिकारी योजना को जमीन पर उतारेंगे? क्या वे मध्य प्रदेश को कर्ज के दलदल से बाहर निकालने के लिए इस ‘नैनो यूरिया’ क्रांति का सहारा लेंगे, या फिर पुराने ढर्रे पर चलकर मुखिया को फिर से कर्ज लेने के लिए विवश करेंगे?
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
- मिट्टी की बिगड़ती सेहत: मध्य प्रदेश में NPK (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) का संतुलन बुरी तरह बिगड़ चुका है। जो अनुपात 4.3:2:1 होना चाहिए था, वह अब 10.9:4.1:1 हो गया है । गेहूं और धान की बेल्ट में मिट्टी बंजर होने की कगार पर है ।
- सब्सिडी का भारी बोझ: राज्य में सालाना 34 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खपत होती है, जिस पर सरकार को भारी-भरकम सब्सिडी देनी पड़ती है ।
- दक्षता की कमी: हैरानी की बात यह है कि खेतों में डाले जाने वाले पारंपरिक यूरिया का केवल 30-40% ही पौधों के काम आता है, बाकी जहर बनकर हमारी मिट्टी और पानी में मिल रहा है ।
क्या है जीरो कॉस्ट फार्मिंग मॉडल?
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने एक ऐसे मॉडल की सिफारिश की है जहाँ किसान को नैनो यूरिया और ड्रोन छिड़काव के लिए एक भी पैसा नहीं देना होगा ।
- नमो ड्रोन दीदी का साथ: प्रशिक्षित ग्रामीण महिलाएं खेतों में ड्रोन से छिड़काव करेंगी, जिससे उर्वरक सीधे पौधों तक पहुंचेगा ।
- पैदावार में बढ़ोतरी: इस तकनीक से फसल की उत्पादकता में 3 से 8% तक का सुधार संभव है ।
- सरकारी खजाने को संजीवनी: यदि सिर्फ 10% यूरिया को भी नैनो यूरिया से बदल दिया जाए, तो राज्य को सालाना ₹950 करोड़ का सीधा वित्तीय लाभ हो सकता है ।
सिस्टम की सुस्ती या अधिकारियों की बेरुखी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नैनो यूरिया को ‘गेम चेंजर’ बताया था । लेकिन क्या मध्य प्रदेश का प्रशासनिक तंत्र इस विजन को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक सही ढंग से पहुँचा पाएगा?
एक तरफ कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने खाद की निर्बाध आपूर्ति की चुनौती है, तो दूसरी तरफ पारंपरिक यूरिया के प्रति ‘अत्यधिक झुकाव’ नैनो क्रांति की रफ्तार को धीमा कर रहा है । अगर अधिकारियों ने इस आधुनिक विकल्प को नजरअंदाज किया, तो राज्य सरकार को खाद की कमी और सब्सिडी के बढ़ते बोझ को संभालने के लिए फिर से कर्ज का रास्ता चुनना पड़ सकता है ।
वक्त आ गया है कि मध्य प्रदेश ‘मॉडल स्टेट’ बनकर उभरे । अब फैसला सरकार के हाथों में है—क्या वे मिट्टी, किसान और खजाने को बचाएंगे, या फिर पुराने सिस्टम की सुस्ती इस कृषि क्रांति पर भारी पड़ेगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा ।









