
नई दिल्ली/विशेष रिपोर्ट:
क्या इस देश की संप्रभुता, सुरक्षा और युवाओं का भविष्य चंद कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरियों में गिरवी रख दिया गया है? यह सवाल आज देश का हर वो नौजवान पूछ रहा है जो कड़कड़ाती ठंड और तपती धूप में देश की सीमा पर खड़े होने का सपना लेकर सड़कों पर दौड़ लगाता था। लेकिन अफ़सोस, आज देश के हालात यह हैं कि ‘सबकुछ बिक रहा है’ और इस महासेल के सबसे बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं—अडानी ग्रुप।
आंकड़े और हकीकत झूठ नहीं बोलते। आंध्र प्रदेश का रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण कृष्णापट्टनम पोर्ट हो, देश के प्रमुख एयरपोर्ट हों, या फिर कभी देश के गौरव और देशभक्ति की नर्सरी कहे जाने वाले सैनिक स्कूल—इन सब पर कॉर्पोरेट की मुहर लग चुकी है।
जो सैनिक स्कूल कल तक देश को वीर सपूत और अनुशासित जांबाज अफसर देते थे, क्या अब वे निजी मुनाफे की फैक्ट्रियां बनेंगे? जब रक्षा और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचे भी ‘साहब के मित्रों’ के हवाले होने लगें, तो देश की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?सबसे दर्दनाक और हैरान करने वाली बात देश के उन 1,55,000 युवाओं की है, जिनकी सैन्य भर्ती (वैकेंसी) को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब सेना के ही एक पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल ने इस गंभीर मुद्दे पर शीर्ष स्तर पर बात करनी चाही और समय मांगा, तो ऊपर से जवाब मिला “साहब को सब पता है, वैकेंसी जब निकालनी होगी, तब देखी जाएगी।
“यह अहंकार नहीं तो क्या है? युवाओं का भविष्य, देश की सुरक्षा व्यवस्था क्या किसी की व्यक्तिगत इच्छा और ‘क्रोनोलॉजी’ के हिसाब से चलेगी? क्या अब सैनिकों की आउटसोर्सिंग होगी? क्या यहां भी किसी खास उद्योगपति का एकाधिकार होगा?इस पूरे घटनाक्रम में देश का सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका है। समाज तीन धड़ों में बंट चुका है:गरीब वर्ग: इन्हें चंद किलो मुफ्त राशन और रेवड़ियों के जाल में उलझाकर आत्मनिर्भर बनने के अधिकार से दूर रख दिया गया है।लोअर मिडिल क्लास (निम्न मध्यम वर्ग): यह वर्ग महंगाई, बेरोजगारी और टैक्स के बोझ तले लगातार पिस रहा है। इसी वर्ग के बच्चे सेना में जाते हैं, जो आज सड़क पर हैं।
अपर मिडिल और हाई क्लास (उच्च वर्ग): यह वर्ग पूरी तरह सत्ता की ‘दलाली’ और झूठे राष्ट्रवाद के नशे में चूर है। इन्हें लगता है कि जब तक इनकी जेब सुरक्षित है, देश बिके तो बिके।
यह उच्च और उच्च-मध्यम वर्ग आज व्यवस्था का सबसे बड़ा चाटुकार बन चुका है। इन्हें मॉल, शेयर बाजार और कॉर्पोरेट प्रॉफिट से फुर्सत नहीं है। जब देश की संपत्तियां बेची जा रही हैं, तब यह वर्ग सोशल मीडिया पर बैठकर ‘गोदी मीडिया’ के प्रोपेगैंडा को सच मानकर तालियां बजा रहा है।देश आज बर्बादी की कगार पर खड़ा है। बुनियादी संसाधन खत्म हो रहे हैं, सरकारी नौकरियां खत्म की जा रही हैं और युवाओं का भविष्य अंधकारमय है।
क्या जनता ऐसे ही दलालों के चक्कर में फंसी रहेगी?क्या देश का निचला और मध्यम वर्ग यूं ही पिसता रहेगा?या फिर इस कॉर्पोरेट-सत्ता गठजोड़ के खिलाफ एक नया जन-आंदोलन खड़ा होगा?याद रखिए, अगर आज चुप रहे, तो आने वाली नस्लें पूछेंगी कि जब देश की धरोहरें और सेना का भविष्य चंद पूंजीपतियों के हाथों बेचा जा रहा था, तब आप किस ‘राष्ट्रवाद’ का झंडा लेकर सो रहे थे?
ब्रांडवाणी समाचार ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।







