डिजिटल सम्मोहन, रील्स के दौर में खोते रिश्ते और बिखरता हुआ परिवार

मुख्य समाचार केंद्र, ब्रांडवाणी मीडिया

विशेष शोध रिपोर्ट: समाज और तकनीक का बदलता स्वरूप

आज हम किसी राजनीतिक उठापटक या आर्थिक मंदी की बात नहीं करेंगे। आज हम बात करेंगे उस ‘धीमे जहर’ की, जो हमारे घरों में, हमारे कमरों में और हमारी सोच में बहुत खामोशी से दाखिल हो चुका है। इंटरनेट की इस चकाचौंध भरी दुनिया का एक ऐसा काला सच, जिसने हमारी मानसिक स्थिरता को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।

ब्रांडवाणी समाचार के एक हालिया जमीनी शोध (Research) में यह बात सामने आई है कि उम्र चाहे अल्हड़ बचपन की हो, युवा जोश की हो या बुजुर्गों के तजुर्बे की—स्मार्टफोन की छोटी सी स्क्रीन ने हर वर्ग के इंसान को मानसिक रूप से बदल दिया है। हमारे भीतर का ‘ठहराव’ अब खत्म हो चुका है। सोचने-समझने की जो गहरी क्षमता कभी हमारी संस्कृति की पहचान हुआ करती थी, वह अब ‘स्क्रॉलिंग’ की भेंट चढ़ चुकी है। आज हमें वही अच्छा लगता है, जो एल्गोरिदम हमें दिखाना चाहता है। हम अपनी पसंद के गुलाम हो चुके हैं।

इस डिजिटल आभासी दुनिया का सबसे बड़ा प्रहार हमारे परिवारों पर हुआ है। “वसुधैव कुटुंबकम” और “संयुक्त परिवार” की बात करने वाले समाज में आज एकता का माहौल पूरी तरह खत्म सा हो चुका है। भाईचारा, मां-बाप का सम्मान और अपनों का साथ—ये तमाम पवित्र रिश्ते इस इंटरनेट की भेंट चढ़ रहे हैं।

सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि अब ‘अपनापन’ खत्म होने की वजह से सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां बोझ लगने लगी हैं। लोग एक ही छत के नीचे रहकर भी अकेलेपन (Isolation) का शिकार हैं। यह इंटरनेट की ही दुनिया है, जिसने सास और बहू के बीच के स्वाभाविक संवाद को खत्म कर एक कृत्रिम दूरी पैदा कर दी है।

आज हमें दूसरों के सोशल मीडिया वाले ‘सजाए हुए घर’ अच्छे लगने लगे हैं, और अपने वास्तविक घर में सिर्फ कमियां और बुराइयां नजर आने लगी हैं। हम हकीकत से दूर, दूसरों के दिखावे से अपने जीवन की तुलना कर रहे हैं।

बात सिर्फ रिश्तों के टूटने तक ही सीमित नहीं है। इस इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हमारी सोच को संकुचित कर दिया है। अब जीवन का एकमात्र पैमाना ‘पैसा’ और ‘दिखावा’ बनकर रह गया है।

हर तरफ चंद सेकेंड की रील वाली रईसी दिखाने की होड़ मची है। महंगे फोन, महंगी गाड़ियां और आलीशान छुट्टियां मनाने के झूठे दिखावे के लिए बैंकों से लोन लेने की अंधी दौड़ शुरू हो चुकी है। हमारा दिमाग आज केवल उन सपनों को देख रहा है और उनके पीछे भाग रहा है, जो चंद सेकेंड की या कुछ दिनों की खुशी तो दे सकते हैं, लेकिन जीवन भर का अपनापन और मानसिक शांति कभी नहीं दे सकते।

सज्जनों, तकनीक हमारी सुविधा के लिए थी, हमारे विनाश के लिए नहीं। यदि आज भी हम सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियां स्क्रीन पर तो जिंदा रहेंगी, लेकिन उनके दिलों में संवेदनाएं मर चुकी होंगी।

लोन की किश्तों से घर तो सज सकता है, लेकिन अपनों के बिना वह घर केवल एक कंक्रीट का ढांचा बनकर रह जाएगा। आइए, दिन में कुछ घंटे इस आभासी दुनिया से ‘लॉग आउट’ करें और अपने माता-पिता, अपनी संतान और अपने जीवनसाथी के साथ ‘लॉग इन’ करें। याद रखिए, स्क्रीन पर दिखने वाले ‘लाइक’ (Likes) अस्थाई हैं, लेकिन परिवार का ‘साथ’ स्थाई है।

ब्रांडवाणी समाचार के लिए, ब्यूरो रिपोर्ट।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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