
आज हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र के उस सबसे बड़े मंदिर की, जहाँ से हर नागरिक को न्याय की उम्मीद होती है। लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति से जो खबर आ रही है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल यह कि क्या भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक आदिवासी महिला को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहती? सवाल यह भी कि मध्य प्रदेश की 2 करोड़ जनता द्वारा चुने गए कांग्रेस विधायकों को राष्ट्रपति भवन से मिलने का समय क्यों नहीं मिला? क्या यह सिर्फ प्रशासनिक देरी है, या फिर इसके पीछे कोई सोची-समझी राजनीतिक साजिश है? आइए देखते हैं इस विशेष रिपोर्ट में।
मध्य प्रदेश की सियासत में इस वक्त उबाल है। वजह है जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की अनदेखी। मध्य प्रदेश की करीब 2 करोड़ जनता ने जिन कांग्रेस विधायकों को अपना भरोसा देकर, अपना दूत बनाकर विधानसभा भेजा, आज उन्हीं जनप्रतिनिधियों को महामहिम राष्ट्रपति से मिलने का समय नहीं दिया गया।यह सिर्फ विधायकों का इंतजार नहीं है, यह मध्य प्रदेश की उस 2 करोड़ जनता का अपमान है जिन्होंने इन नेताओं को चुनकर दिल्ली भेजा था।
आखिर देश के सर्वोच्च सदन के दरवाजे जनता के इन दूतों के लिए क्यों बंद कर दिए गए?लेकिन बात सिर्फ समय न मिलने की नहीं है, बात नीयत की भी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि राज्यसभा चुनाव के समीकरणों के बीच, कांग्रेस की कद्दावर नेता और आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली मीनाक्षी नटराजन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पर्दे के पीछे से खेल खेला जा रहा है।
सवाल नंबर 1: क्या मीनाक्षी नटराजन का आदिवासी महिला होना उनकी राह का रोड़ा बनाया जा रहा है?
सवाल नंबर 2: जो BJP आदिवासियों के कल्याण का ढोल पीटती है, वह एक सशक्त आदिवासी महिला नेता को राज्यसभा जाने से रोकने के लिए इतनी बेताब क्यों है?
सवाल नंबर 3: क्या राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल विपक्ष की आवाज को दबाने और मध्य प्रदेश की जनता के मुद्दों को अनसुना करने के लिए किया जा रहा है?
कांग्रेस पार्टी और आदिवासी समाज आज इस उपेक्षा के खिलाफ पूरी तरह लामबंद हैं। मीनाक्षी नटराजन ने हमेशा आदिवासियों, वंचितों और शोषितों की लड़ाई जमीनी स्तर पर लड़ी है। आज जब उनके राज्यसभा जाने और आदिवासियों की मजबूत आवाज बनने का समय आया, तो विपक्ष को दबाने की राजनीति शुरू हो गई।
विधायकों को समय न देना और मीनाक्षी नटराजन के रास्ते में अड़ंगे लगाना, साफ दर्शाता है कि सत्ता में बैठे लोग आदिवासियों का वोट तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें नेतृत्व सौंपने से कतराते हैं।लोकतंत्र जनता से चलता है, और जनता के चुने हुए दूतों को राष्ट्रपति भवन में समय न मिलना बेहद चिंताजनक है। ब्रैंडवाणी समाचार सत्ता और व्यवस्था से यह सीधा सवाल पूछता है कि आखिर कब तक आदिवासी समाज और जनता के जनादेश के साथ इस तरह का राजनीतिक खिलवाड़ होता रहेगा?
क्या महामहिम इस मामले पर संज्ञान लेंगी या फिर 2 करोड़ जनता की यह आवाज दिल्ली के दरबार में गूँजकर शांत हो जाएगी? इस खबर पर हमारी नजर बनी रहेगी। देश और प्रदेश की तमाम बेबाक खबरों के लिए देखते रहिए







