
आज हम देश के उस सबसे बड़े सच से पर्दा उठाने जा रहे हैं, जिसे सियासी रैलियों के शोर और मुफ़्त की रेवड़ियों के नीचे दफ़न कर दिया गया है। देश के सरकारी स्कूलों का भविष्य आज वेंटिलेटर पर है, या यूं कहें कि हमारे नौनिहालों का भविष्य अंधकार के गर्त में धकेल दिया गया है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के आंकड़े इतने खौफनाक हैं कि किसी भी संवेदनशील नागरिक की रूह कांप जाए। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि देश में 10 में से 4 बच्चे अनपढ़ रह जा रहे हैं, वे हायर सेकेंडरी की दहलीज तक भी नहीं पहुंच पा रहे। आखिर क्यों? क्योंकि इस देश में शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट और प्राइवेटाइजेशन के हाथों का खिलौना बन चुकी है।
ज़रा गौर कीजिए इन शर्मनाक आंकड़ों पर, जो व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा हैं:
94,000 सरकारी स्कूल बंद: देश में हज़ारों सरकारी स्कूलों पर ताले लटक चुके हैं।
एक शिक्षक के भरोसे लाखों का भविष्य: अकेले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में आज 6 से 7 लाख बच्चे जिन सरकारी स्कूलों में जा रहे हैं, उनमें से कई स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ज़रा सोचिए, अगर वो एक शिक्षक बीमार हो जाए, तो लाखों बच्चों का भविष्य उसी दिन बीमार और लाचार हो जाता है।
सरकारी स्कूलों से मोहभंग: साल 2005 तक देश के 71% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। आज यह आंकड़ा सिमटकर मात्र 25% रह गया है।
सवाल यह है कि क्या यह गिरावट महज़ एक इत्तेफाक है, या फिर गरीबों को शिक्षा से मरहूम रखने की कोई गहरी और सोची-समझी साजिश?
हम मंचों से चिल्लाते हैं—’बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’। लेकिन हकीकत यह है कि हमारी बेटियां स्कूल जाने से कतरा रही हैं। क्यों? क्योंकि आज के इस डिजिटल युग में भी सरकारी स्कूलों में बेटियों के लिए एक अदद साफ और अलग टॉयलेट (बाथरूम) तक मयस्सर नहीं है। जिस देश की सरकारें चांद पर जाने का दावा करती हैं, वो अपनी बेटियों को एक सुरक्षित और बुनियादी सुविधा तक नहीं दे पा रही हैं। शिक्षा के स्तर को ज़ीरो (शून्य) पर लाकर खड़ा कर दिया गया है।
ब्रांडवाणी समाचार आज इस देश के नीति-निर्माताओं और खुद को जागरूक समझने वाले समाज से कुछ बेहद कड़वे और तीखे सवाल पूछ रहा है:
1. क्या देश में सिर्फ झूठ और फरेब के दम पर सरकारें चलाई जा रही हैं? क्या सच की अहमियत इस समाज में पूरी तरह खत्म हो चुकी है?
2. क्या देश का आम मां-बाप सरकारों की मुफ़्त योजनाओं (फ्री राशन और रेवड़ियों) के लालच में आकर, अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य की बलि चढ़ा रहा है? क्या चंद रुपयों की खैरात आपके बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा कीमती हो गई है?
3. क्या अपर-मिडिल क्लास और हाई क्लास का एक बड़ा तबका, अपनी आंखें मूंदकर सिर्फ झूठे नैरेटिव और खोखले मुद्दों का समर्थन कर रहा है? क्या असल मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार) को दरकिनार कर नफ़रत और ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है?
यह घटिया चाल-चरित्र, यह प्रशासनिक लापरवाही और समाज की यह आपराधिक खामोशी—क्या इस देश और समाज को बचा पाएगी? बिल्कुल नहीं। एक अनपढ़ और अशिक्षित समाज कभी विश्वगुरु नहीं बन सकता। अगर आज भी हम मुफ़्त के टुकड़ों पर पलने वाली राजनीति के तलवे चाटते रहे और अपने हक की शिक्षा के लिए आवाज़ नहीं उठाई, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।
वक्त आ गया है कि इस झूठे ढोंग को बेनकाब किया जाए और सरकारों से पूछा जाए कि हमारे बच्चों की कलम को किसने और क्यों छीना?
कैमरामैन के साथ, ब्रांडवाणी समाचार।






