जब प्रोफेसर ही बन जाए ‘मुनाफे का सौदागर’, तो क्या खाक बचेगी शिक्षा की शुचिता? सीएमओ के वरदहस्त में डूबा उच्च शिक्षा का सम्मान!

विधानसभा में अयोग्य, लोकायुक्त के घेरे में, फिर भी ‘कमाई’ वाली कुर्सियों पर कब्ज़ा! भोज यूनिवर्सिटी के बाद अब MP-SCIAA में भी डॉ. सुनील मंडेलिया का जलवा; क्या मुख्यमंत्री की ‘ईमानदारी’ की परिभाषा अपनों के लिए बदल जाती है?

भोपाल। मध्य प्रदेश के प्रशासनिक और राजनैतिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है—”क्या अब गुरु का काम ज्ञान बांटना नहीं, बल्कि मलाई चाटना रह गया है?

“जब देश और सूबे की सबसे शक्तिशाली व्यवस्था यानी मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ही किसी दागी चेहरे के लिए ढाल बन जाए, तो नियम-कायदे और नैतिकता सिर्फ कागजों का खिलौना बनकर रह जाते हैं। मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. सुनील मंडेलिया का मामला आज सूबे की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा कलंक बन चुका है। लेकिन कहानी सिर्फ रजिस्ट्रार की कुर्सी तक सीमित नहीं है, इसके पीछे खेल ‘कमाई और रसूख’ के उस गठजोड़ का है जिसने पूरे सिस्टम को घुटनों पर ला दिया है।मूल रूप से एक प्रोफेसर, जिसका मुख्य दायित्व छात्रों का भविष्य संवारना और विश्वविद्यालय में ज्ञान की रोशनी फैलाना होना चाहिए, वह आखिर रजिस्ट्रार की प्रशासनिक कुर्सी पर क्यों कुंडली मारकर बैठा है? गलियारों में चर्चा आम है कि रजिस्ट्रार का पद नीतिगत फैसलों और ‘वित्तीय कमान’ (कमाई) का केंद्र होता है।

बड़ा सवाल: क्या मध्य प्रदेश में शिक्षा का स्तर इस कदर डूब चुका है कि अब शिक्षक ब्लैकबोर्ड छोड़कर तिजोरियां भरने के खेल में शामिल हो गए हैं? जब एक प्रोफेसर का मोह चाक और डस्टर से भंग होकर ‘कमाई’ वाली प्रशासनिक कुर्सियों की तरफ बढ़ने लगे, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था वेंटिलेटर पर है।

डॉ. मंडेलिया के रसूख का अंदाजा इस बात से लगाइए कि लोकायुक्त के गंभीर आरोपों और विधानसभा के पटल पर अयोग्य साबित होने के बाद भी, उन्हें MP-SCIAA (State Level Environment Impact Assessment Authority) जैसी बेहद महत्वपूर्ण और ‘प्रभावशाली’ संस्था में सदस्य मनोनीत कर दिया जाता है।सब जानते हैं कि पर्यावरण क्लीयरेंस और एनओसी (NOC) से जुड़ी इस संस्था में कितनी ‘ताकत’ और ‘कमाई’ छिपी है।

एक तरफ उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार और एसीएस (ACS) अनुपम राजन की फाइलें रद्दी साबित हो रही हैं।दूसरी तरफ इस विवादित प्रोफेसर को एक के बाद एक मलाईदार पदों से नवाजा जा रहा है।

क्या सरकार में योग्य और ईमानदार अधिकारियों का अकाल पड़ गया है, या फिर इस रसूखदार अफसर के ‘पॉलिटिकल गॉडफादर’ के आगे पूरी सरकार नतमस्तक हो चुकी है?

ब्रांडवाणी समाचार आज सीधे सूबे के मुखिया (मुख्यमंत्री) और मुख्य सचिव महोदय से यह तीखा सवाल पूछ रहा है:क्या आपकी ‘जीरो टॉलरेंस’ और ईमानदारी की नीति इस प्रोफेसर पर लागू नहीं होती?क्या विधानसभा के लोकतंत्र के मंदिर में दी गई दलीलों की कोई कीमत नहीं है?क्या यह पूरी ईमानदारी जनता की आंखों में झूल झोंकने के लिए महज़ एक ढोंग है?

जब खुद ‘कोतवाल’ यानी सीएमओ ही रक्षक की भूमिका में आ जाए, तो 15 जून की ट्रांसफर डेडलाइन का डर किसे होगा? मंत्रालय के भीतर की सुगबुगाहट बताती है कि इस रसूखदार प्रोफेसर को हिलाने की हिम्मत फिलहाल किसी में दिखाई नहीं दे रही है। विभाग पूरी तरह झुक चुका है और मंत्री-सचिव सिर्फ मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रहे हैं।

“जब शिक्षक ही भूल जाए मर्यादा, और ढूंढने लगे मुनाफे का जरिया तो समझो डूब गई शिक्षा, और ढोंग बन गई सरकार की कत्थई नैया! विधानसभा में जो अयोग्य, वो आज मलाईदार पदों पर भारी। देखिए, कैसे एक प्रोफेसर के रसूख के आगे बौना हुआ मध्य प्रदेश का पूरा सिस्टम, सिर्फ ब्रांडवाणी समाचार पर।”जवाब का इंतजार पूरे सूबे को है…

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

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