पिघलते ग्लेशियर, बढ़ती गर्मी और बाढ़ का खतरा, क्या भारत जलवायु संकट के निर्णायक दौर में?

देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश, अचानक आने वाली बाढ़ और हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की घटनाओं ने जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंताओं को और गहरा कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऐसे कई मौसमीय बदलाव देखे हैं, जिन्हें कभी असामान्य माना जाता था, लेकिन अब वे धीरे-धीरे सामान्य होते जा रहे हैं। उत्तर भारत में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव, पहाड़ी राज्यों में ग्लेशियरों का सिकुड़ना और मानसून के दौरान अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ यह संकेत दे रही हैं कि प्रकृति का संतुलन तेजी से बदल रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों का पिघलना केवल पहाड़ों तक सीमित समस्या नहीं है। ये ग्लेशियर गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी महत्वपूर्ण नदियों के प्रमुख जल स्रोत हैं। यदि ग्लेशियर तेजी से पिघलते रहे, तो शुरुआती वर्षों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, जबकि लंबे समय में जल संकट की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि ग्लेशियर झीलों के फटने (GLOF) की घटनाएं भी भविष्य में अधिक विनाशकारी साबित हो सकती हैं, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

दूसरी ओर, देश के कई हिस्सों में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। हीटवेव अब केवल कुछ दिनों की समस्या नहीं रह गई, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली चुनौती बनती जा रही है। अत्यधिक गर्मी का असर कृषि उत्पादन, जल संसाधनों, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ऊर्जा मांग पर साफ दिखाई दे रहा है। वहीं, मानसून के दौरान कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और अन्य क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति यह दर्शाती है कि मौसम का पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहा है। इससे किसानों, शहरी योजनाकारों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह नहीं मानते कि भारत किसी तत्काल ‘प्रलय’ की स्थिति में पहुंच गया है, लेकिन वे इस बात पर जोर देते हैं कि जलवायु परिवर्तन के संकेतों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। यदि कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने और जलवायु अनुकूल विकास नीतियों को लागू करने की दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं। इसलिए पिघलते ग्लेशियर, बेकाबू गर्मी और बढ़ती बाढ़ को केवल मौसमी घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी के रूप में देखने की आवश्यकता है।

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