मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसान आंदोलन तेज, मोहन सरकार पर उठे बड़े सवाल

क्या मध्य प्रदेश का किसान एक बार फिर बड़े आंदोलन की दहलीज पर खड़ा है?

क्या भोपाल के गलियारों से उठती राजनीति और सड़कों पर गूंजता अन्नदाता का आक्रोश, मध्य प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा सियासी बवंडर बनने जा रहा है?

खरीद के लिए तरसती मूंग की फसल और अपने जायज हक के लिए कड़कती धूप में सड़कों पर उतरा किसान… आज मध्य प्रदेश का अन्नदाता एक ही सवाल पूछ रहा है—आखिर कब तक?

मध्य प्रदेश को कृषि प्रधान राज्य कहा जाता है, लेकिन आज यही का किसान अपने ही पसीने की कीमत मांगने के लिए मजबूर है। मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीदी न होने से किसान बर्बादी की कगार पर पहुँच चुके हैं। आंदोलनरत किसानों का गुस्सा अब फूट पड़ा है। किसानों का सीधा और कड़वा सवाल है—“अगर सरकार के पास विधायकों की खरीद-फरोख्त के लिए करोड़ों रुपये हैं, तो फिर किसानों की मूंग उनके सही दाम पर खरीदने के लिए बजट क्यों खत्म हो जाता है?”

किसानों के मुख्य सवाल जो वे सरकार से पूछ रहे हैं

  • क्या सरकार केवल राजनीति के लिए बजट रखती है और कितनी खेलेगी मोहन सरकार किसान से?
  • क्या किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य न देकर उन्हें लूटा जा रहा है?
  • खेती की लागत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है—खाद, बीज, डीजल और सिंचाई के दाम आसमान छू रहे हैं। लेकिन जब फसल बेचने की बारी आती है, तो सरकार खरीद केंद्रों के दरवाजे बंद कर देती है या फिर समर्थन मूल्य देने से आनाकानी करती है।
  • ये मोहन और शिवराज डबल इंजन की सरकार।

अब निगाहें टिकी हैं मध्य प्रदेश की राजनीति के दो सबसे बड़े और आक्रामक नेताओं पर—उमंग सिंघार और मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी। यह दोनों नेता हमेशा से प्रदेश की जनता और किसानों की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या यह केवल बयानों तक सीमित रहेगा या फिर कोई ऐतिहासिक कदम उठाया जाएगा?

किसानों का कहना है कि अगर उमंग सिंघार और जीतू पटवारी वाकई अन्नदाता के साथ हैं, तो उन्हें इस आंदोलन का सीधा नेतृत्व संभालना होगा।

  • क्या ये दोनों दिग्गज नेता सड़कों पर उतरकर किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे?
  • क्या इस जनआंदोलन की ताकत से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस्तीफे की सीधी मांग की जाएगी?
  • क्या यह आंदोलन मध्य प्रदेश की शिवराज-मोहन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरेगा?

क्या सरकार किसानों के हित में काम नहीं करना चाहती?

एक तरफ सरकार का दावा है कि वह किसान कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर किसान पाई-पाई के लिए मोहताज हो रहा है।

अगर सरकार समय रहते मूंग की पूर्ण खरीदी का फैसला नहीं लेती, तो यह आंदोलन केवल मंडियों तक सीमित नहीं रहेगा। यह ज्वाला पूरे मध्य प्रदेश के हर जिले, हर गांव तक पहुंचेगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस के ये दो प्रमुख चेहरे इस आंदोलन को जनांदोलन में बदलने में कामयाब रहे, तो प्रदेश का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।

मध्य प्रदेश के इतिहास में किसानों के आंदोलनों ने हमेशा बड़े-बड़े सिंहासन हिलाए हैं। आज फिर इतिहास खुद को दोहराने की राह पर है।

डॉ. मोहन यादव की सरकार के लिए यह समय कड़ी परीक्षा का है। क्या सरकार किसानों की जायज मांगों के आगे झुकेगी? या फिर विपक्ष और किसानों का यह संयुक्त मोर्चा सरकार की नींव हिलाकर रख देगा?

अंत में सवाल आपसे—

  • क्या आपको लगता है कि सरकार को किसानों की पूरी मूंग समर्थन मूल्य पर खरीदनी चाहिए?
  • क्या किसानों को ये लगने लगा है कि ये डबल इंजन की सरकार किसान विरोधी सरकार है?
  • क्या उमंग सिंघार और जीतू पटवारी को इस लड़ाई को अंतिम अंजाम तक पहुंचाना चाहिए?

अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर दें और मध्य प्रदेश के इस ऐतिहासिक किसान आंदोलन की हर अपडेट के लिए देखते रहिए ब्रांडवाणी समाचार।

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