आधुनिक भारत के शिल्पकार राजीव गांधी: दूरदर्शी फैसलों ने रखी 21वीं सदी के भारत की नींव

शिवपुरी/ रानू परिहार: पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न राजीव गांधी की जयंती पर देश उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। 20 अगस्त 1944 को जन्मे राजीव गांधी ने 31 अक्टूबर 1984 को अपनी मां और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की बागडोर संभाली। महज 40 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव गांधी भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में शामिल रहे। वर्ष 1984 से 1989 तक उनका कार्यकाल करीब पांच वर्ष का रहा, लेकिन इस दौरान विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, संचार और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर लिए गए कई फैसलों ने आने वाले दशकों के भारत की दिशा प्रभावित की।

राजीव गांधी का जोर आधुनिक तकनीक को आम लोगों तक पहुंचाने पर था। यही वजह है कि उन्हें भारतीय सूचना और दूरसंचार क्रांति के शुरुआती दौर के प्रमुख राजनीतिक सूत्रधारों में गिना जाता है।

छह टेक्नोलॉजी मिशन से गांवों तक पहुंची विकास की सोच

राजीव गांधी के कार्यकाल में तकनीक को देश की प्रमुख समस्याओं के समाधान का माध्यम बनाने पर जोर दिया गया। वैज्ञानिक सैम पित्रोदा के सहयोग से कई तकनीकी मिशनों को आगे बढ़ाया गया।

दूरसंचार के क्षेत्र में सी-डॉट जैसी संस्थागत पहल और ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीफोन नेटवर्क के विस्तार ने संचार व्यवस्था को नई दिशा दी। बाद के वर्षों में STD-PCO का विस्तार हुआ और आम लोगों के लिए दूरसंचार सेवाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक सुलभ हुईं।

इसी तरह पेयजल, साक्षरता, टीकाकरण, डेयरी विकास और खाद्य तेल उत्पादन जैसे क्षेत्रों में मिशन आधारित कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया। इन पहलों का उद्देश्य तकनीक और सरकारी योजनाओं को शहरों से निकालकर गांवों तक पहुंचाना था।

कंप्यूटर और आईटी क्रांति की रखी गई आधारशिला

जब भारत में कंप्यूटर को लेकर आशंकाएं और बहस चल रही थीं, उस दौर में राजीव गांधी ने कंप्यूटरीकरण और आधुनिक तकनीक को भविष्य की जरूरत के तौर पर देखा। कंप्यूटर और दूरसंचार क्षेत्र में नीतिगत बदलाव किए गए तथा तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया गया।

रेलवे की कंप्यूटरीकृत आरक्षण व्यवस्था जैसी पहलों ने आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन में तकनीक की उपयोगिता को सामने रखा। आगे चलकर यही तकनीकी माहौल भारत के आईटी और सॉफ्टवेयर क्षेत्र के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण आधार बना।

शिक्षा के क्षेत्र में नवोदय विद्यालय और नई शिक्षा नीति

राजीव गांधी के विजन में शिक्षा को विशेष स्थान मिला। वर्ष 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई गई, जिसमें प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के साथ उच्च, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा पर भी जोर दिया गया।

इसी दौर में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड जैसी पहल के जरिए प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया। वहीं ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों की प्रतिभाओं को बेहतर अवसर देने के उद्देश्य से जवाहर नवोदय विद्यालयों की अवधारणा को आगे बढ़ाया गया।

इन आवासीय विद्यालयों ने ग्रामीण पृष्ठभूमि के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आवास और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1985 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना ने उच्च शिक्षा को अधिक व्यापक और सुलभ बनाने की दिशा में भी रास्ता खोला।

सत्ता को गांव तक पहुंचाने का सपना

राजीव गांधी पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करने के पक्षधर थे। उनका जोर इस बात पर था कि विकास और निर्णय लेने की प्रक्रिया केवल दिल्ली या राज्यों की राजधानियों तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों तक पहुंचे।

उनकी सरकार ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने के लिए संविधान संशोधन का प्रयास किया। हालांकि उस समय यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के जरिए स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक आधार मिला।

इसी तरह 1988 में संसद से पारित 61वें संविधान संशोधन अधिनियम के बाद मतदान की न्यूनतम आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई। इससे देश के करोड़ों युवाओं को सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर मिला।

रोजगार और गरीब कल्याण पर भी जोर

ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने के लिए जवाहर रोजगार योजना शुरू की गई। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के साथ गांवों में सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण करना था।

इंदिरा आवास योजना के माध्यम से ग्रामीण गरीब और कमजोर वर्गों को आवास उपलब्ध कराने के प्रयासों को भी आगे बढ़ाया गया। वहीं 1986 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत पर्यावरण और नदी संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी राष्ट्रीय पहल के रूप में हुई।

आर्थिक सुधारों की शुरुआती जमीन भी तैयार हुई

राजीव गांधी के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था में तकनीक, निजी निवेश और औद्योगिक आधुनिकीकरण को लेकर कई बदलावों की शुरुआत हुई। लाइसेंस व्यवस्था को सरल करने, आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देने और कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए।

इसी वजह से कई अर्थशास्त्री राजीव गांधी के दौर को 1991 के व्यापक आर्थिक सुधारों से पहले की शुरुआती सुधार प्रक्रिया के रूप में भी देखते हैं। हालांकि भारत का बड़ा आर्थिक उदारीकरण 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुआ।

शांति समझौतों से राष्ट्रीय एकता मजबूत करने का प्रयास

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते पंजाब, असम और मिजोरम सहित कई क्षेत्रों में लंबे समय से चले आ रहे विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने के प्रयास किए गए। 1985 का पंजाब समझौता, असम समझौता और 1986 का मिजोरम समझौता उनके कार्यकाल की प्रमुख राजनीतिक पहलों में गिने जाते हैं।

इन समझौतों का उद्देश्य क्षेत्रीय असंतोष को कम करना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए समाधान तलाशना था।

जयंती पर ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में स्मरण

राजीव गांधी को मरणोपरांत 1991 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। उनकी जयंती 20 अगस्त को देश में ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में भी मनाई जाती है।

राजीव गांधी का राजनीतिक जीवन भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन कंप्यूटर, दूरसंचार, शिक्षा, युवा मताधिकार, पंचायती राज और तकनीकी आधुनिकीकरण को लेकर उनकी सोच ने भारतीय राजनीति और नीति निर्माण पर लंबा प्रभाव छोड़ा। आज डिजिटल तकनीक और आधुनिक संचार भारत के विकास का अभिन्न हिस्सा हैं, ऐसे में राजीव गांधी के कार्यकाल में शुरू हुई कई पहलों को उस बदलाव की शुरुआती कड़ियों के रूप में देखा जाता है।

यह भी पढ़े: छतरपुर में छात्रावास अधीक्षक पर नाबालिग से यौन शोषण का आरोप, पुलिस जांच में जुटी

 
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Manisha Gupta

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