
प्रमुख सचिव स्तर के एक साहब लंबे समय से डेप्युटेशन पर जाने की कोशिश में जुटे हुए थे। वजह भी खास बताई जा रही है-साहब का परिवार लंदन में रह रहा है और उनका मन भी परिवार के पास पहुंचने को बेताब था। डेप्युटेशन के लिए साहब ने अपने स्तर पर खूब प्रयास किए, लेकिन फिलहाल बात नहीं बन पाई।
इसी बीच सरकार ने साहब को एक बड़ा और नया विभाग थमा दिया। जिम्मेदारी मिलते ही साहब की कार्यशैली में ऐसा बदलाव आया कि पुराने सहयोगी भी हैरान हैं। कुछ समय पहले तक ऑफिस टाइम खत्म होते ही घर की राह पकड़ने वाले साहब अब रात नौ बजे तक दफ्तर में बैठ रहे हैं।
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सिर्फ इतना ही नहीं, साहब ने विभाग के सभी कार्यालयों के दौरे का कार्यक्रम भी तैयार कर लिया है। अब फाइलों पर दस्तखत करने से आगे बढ़कर विभाग की बारीकियां समझने में भी उनकी दिलचस्पी नजर आ रही है। कौन सा काम कैसे होता है, कहां क्या दिक्कत है और व्यवस्था में कहां सुधार की गुंजाइश है साहब इसकी जानकारी जुटाने में लगे हैं।
अब इस बदलाव की वजह नई जिम्मेदारी का उत्साह है या डेप्युटेशन की उम्मीद फिलहाल कमजोर पड़ गई है, यह तो साहब ही बेहतर जानते होंगे। लेकिन ब्यूरोक्रेसी के गलियारों में चर्चा जरूर है कि लंदन जाने की चाहत ने साहब को पहले दफ्तर से दूर किया था, लेकिन बड़े विभाग ने अचानक उन्हें दफ्तर के इतना करीब ला दिया कि अब रात नौ बजे तक कुर्सी छोड़ने का मन नहीं करता।
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