
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बच्चों में बढ़ते ‘स्क्रीन टाइम’ और मोबाइल के इस्तेमाल पर गहरी चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि आजकल बच्चे मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में अधिक उलझे रहते हैं, ऐसे में उनके शारीरिक, मानसिक और सर्वांगीण विकास के लिए खेलकूद (फिजिकल एक्टिविटी) अनिवार्य रूप से बेहद जरूरी है।
खेलों को मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21ए) बनाने की मांग
यह याचिका ‘स्पोर्ट्स: अ वे ऑफ लाइफ’ एनजीओ के अध्यक्ष और खेल शोधकर्ता डॉ. कनिष्का पांडे द्वारा दाखिल की गई है। याचिका में मांग की गई है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए (शिक्षा का अधिकार) के तहत खेलों को भी मौलिक अधिकार घोषित किया जाए। साथ ही केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा तथा खेलों में किसी प्रकार का भेदभाव न करें और नर्सरी से लेकर पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर तक के पाठ्यक्रम में खेलकूद को अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। याचिका में स्कूलों के कुल बजट में से एक निश्चित हिस्सा खेलों के बुनियादी ढांचे के लिए आरक्षित करने की भी अपील की गई है।
अमाइकस क्यूरी की सिफारिश पर मांगा जवाब, 22 सितंबर को अगली सुनवाई
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (अमाइकस क्यूरी) ने अदालत को सुझाव दिया कि देश के प्रत्येक स्कूल में अनिवार्य रूप से फिजिकल एक्टिविटी की व्यवस्था होनी चाहिए। न्यायमूर्ति की पीठ ने अमाइकस क्यूरी की रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता से जवाब मांगते हुए मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर तय की है।
बढ़ते स्क्रीन टाइम से बच्चों के स्वास्थ्य पर असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, टीवी, मोबाइल और टैबलेट पर अत्यधिक समय बिताने से बच्चों के भाषाई, शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2 वर्ष से छोटे बच्चों का स्क्रीन टाइम पूरी तरह शून्य होना चाहिए, जबकि बड़े बच्चों के लिए भी इसे सीमित रखना अत्यंत आवश्यक है। अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि न्यायपालिका बच्चों के स्वास्थ्य और खेल-कूद को लेकर गंभीर है।
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