
‘मध्य प्रदेश अजब है, सबसे गजब है‘—यह पंक्तियां पर्यटन के विज्ञापनों में भले अच्छी लगती हों, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में यह घोटालों और अव्यवस्थाओं की नई परिभाषा गढ़ रही हैं। प्रदेश का जनजातीय कार्य विभाग इन दिनों योजनाओं, खरीदी और बजट प्रबंधन के नाम पर गंभीर सवालों के घेरे में है। मंत्रालय में बैठे प्रमुख सचिव से लेकर आयुक्त स्तर की लॉबी और नीचे उप-संचालक स्तर तक फैले तंत्र पर 130 करोड़ रुपये से अधिक की सामग्री खरीद और वित्तीय आवंटन में अनियमितताओं के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
जमीनी हकीकत, फंड गायब, छात्र सड़कों पर
एक तरफ जहां करोड़ों रुपये के बजट कागजों में खपाए जा रहे हैं, वहीं धरातल पर आदिवासी बाहुल्य जिलों में छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं:
· बड़वानी में फंड का हिसाब नहीं, एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों व आदिवासी छात्रावासों में भोजन, नाश्ते और आवश्यक सामग्री के शासकीय फंड के खर्च का विस्तृत ब्यौरा न मिलने पर जयस व छात्र संगठनों को सड़कों पर उतरकर ज्ञापन सौंपना पड़ रहा है।
· रतलाम में पलंग तक नहीं, सुभाष चंद्र बोस छात्रावास के छात्र बुनियादी सुविधाओं जैसे सोने के पलंग तक के लिए कलेक्ट्रेट के चक्कर काट रहे हैं।
· मुरैना और शहडोल में बदहाली, कहीं ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को कृषि विषय की किताबें नहीं मिल रही हैं, तो कहीं स्कूल भवन की जर्जर छत की मरम्मत के लिए छात्रों को प्रदर्शन करना पड़ रहा है।
फ्रीबीज योजनाओं की आड़ में बंदरबांट की आशंका
प्रदेश में महिलाओं को प्रति माह दी जाने वाली 1500 रुपये जैसी प्रत्यक्ष लाभ योजनाओं के क्रियान्वयन और सत्यापन पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि निष्पक्ष और पारदर्शी ऑडिट कराया जाए, तो अपात्रों के नाम पर राशि निकासी और वितरण तंत्र में बड़े फर्जीवाड़े से इनकार नहीं किया जा सकता। जनकल्याणकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम पंक्ति तक पहुंचने के बजाय प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही की भेंट चढ़ता दिख रहा है।
बड़ा सवाल– गाज हमेशा छोटे कर्मचारियों पर ही क्यों?
जब भी किसी खरीदी या योजना में गड़बड़ी उजागर होती है, तो आनन-फानन में फील्ड स्तर के छोटे कर्मचारियों या उप-संचालक स्तर के अधिकारियों को निलंबित कर मामला शांत कर दिया जाता है।
· क्या नीतिगत निर्णय लेने वाले मंत्रालय और संचनालय में बैठे शीर्ष आईएएस अधिकारी कभी जवाबदेह ठहराए जाएंगे?
· 130 करोड़ रुपये के बड़े बजट के अनुमोदन और टेंडर प्रक्रिया में शामिल शीर्ष नीति-निर्माताओं पर निष्पक्ष जांच, निलंबन या बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई कब होगी?
भारतीय जनता पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव में ‘जीरो टॉलरेंस‘ के दावों के बीच यह देखना बाकी है कि क्या यह जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रहेगी या ट्राइबल विभाग के सिंडिकेट के शीर्ष चेहरों तक पहुंचेगी।
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