
भोपाल। मध्यप्रदेश भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है—यह चर्चा अब केवल सियासी गलियारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बैठकों के मंचों पर भी साफ दिखाई देने लगी है। हाल ही में प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित एक बेहद महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक से प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की दूरी ने सत्ता और संगठन के बीच जारी अंदरूनी खींचतान को हवा दे दी है।
बैठक में प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह और सह-प्रभारी सतीश उपाध्याय पूरी तरह सक्रिय दिखे, लेकिन मुख्य कुर्सी से प्रदेश अध्यक्ष की गैरमौजूदगी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक को चौंका दिया है।
प्रभारी-सहप्रभारी की मौजूदगी, फिर अध्यक्ष नदारद क्यों?
प्रदेश संगठन की इस रणनीतिक बैठक में प्रदेश प्रभारी डॉ. महेंद्र सिंह और सह-प्रभारी सतीश उपाध्याय ने आगामी सांगठनिक रूपरेखा और कार्ययोजना पर चर्चा की। आमतौर पर ऐसी उच्चस्तरीय बैठकों की अगुवाई प्रदेश अध्यक्ष के हाथों में होती है। लेकिन खंडेलवाल का इस महत्वपूर्ण बैठक से किनारा करना कई असहज सवाल खड़े कर रहा है:
- क्या प्रदेश अध्यक्ष ने वाकई संगठन की मुख्यधारा से दूरी बना ली है?
- क्या यह केवल व्यस्तता का मामला है या फिर कोई गहरा रणनीतिक मौन?
- या फिर सत्ता (मुख्यमंत्री) और संगठन (प्रदेश अध्यक्ष) के बीच वर्चस्व की कोई अनदेखी जंग शुरू हो चुकी है?
सीएम बनाम प्रदेश अध्यक्ष: सियासी गलियारों में सुगबुगाहट
सियासी पंडितों का मानना है कि सत्ता और संगठन के बीच तालमेल की कमी अब सतह पर आने लगी है। प्रशासनिक फैसलों, सांगठनिक नियुक्तियों और सरकार के कामकाज में पार्टी संगठन के हस्तक्षेप को लेकर मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच खींचतान की खबरें लंबे समय से छन-छन कर बाहर आ रही थीं।
बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति को इसी शीतयुद्ध की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। अंदरखाने से खबर है कि कई नीतिगत फैसलों और जिलों में शक्ति संतुलन को लेकर दोनों शीर्ष चेहरों के बीच असहमति का दौर चल रहा है।
कार्यकर्ताओं में असमंजस, विपक्ष को मिला मौका
एक तरफ जहां केंद्रीय नेतृत्व मध्यप्रदेश में ‘सब ठीक है’ का संदेश देने की कोशिश में जुटा है, वहीं प्रभारी और सह-प्रभारी की मौजूदगी वाली बैठक में प्रदेश मुखिया का न होना नीचे तक गलत संदेश भेज रहा है। जमीनी कार्यकर्ताओं में असमंजस का माहौल है कि आखिर निर्देश किससे लिए जाएं। दूसरी ओर, इस घटनाक्रम ने मुख्य विपक्षी दल को भी भाजपा की आंतरिक गुटबाजी पर चुटकी लेने का खुला मौका दे दिया है।
ब्रांडवाणी का नजरिया
राजनीति में कोई भी अनुपस्थिति महज इत्तेफाक नहीं होती, खासकर तब जब बैठक का संचालन केंद्रीय प्रभारी कर रहे हों। यदि समय रहते संगठन और सत्ता के बीच का यह फासला पाटा नहीं गया, तो आने वाले दिनों में यह अंतर्कलह पार्टी के सांगठनिक ढांचे के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। अब देखना यह होगा कि केंद्रीय नेतृत्व इस खींचतान को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाता है।






