लोकतंत्र की चौखट पर सिसकती संवेदनाएं, भारतीय जनता पार्टी की सत्ता के दस सितारा शीशमहल और पिसती जनता की मूक चीख

लोकतंत्र की आत्मा ईंट-गारे के भव्य भवनों, विज्ञापनों के रंगीन पोस्टरों या जनसभाओं में लगने वाले गगनभेदी नारों में नहीं बसती; लोकतंत्र की आत्मा उस अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आंखों में बसती है, जो दो वक्त की सूखी रोटी और स्वाभिमान के साथ जीने के अधिकार के लिए हर दिन संघर्ष करता है। जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का काफिला मध्य प्रदेश के सुदूर वनांचल बालाघाट की लाल मिट्टी पर पहुंचा और वहां के आदिवासी समाज की सिसकियों, अनसुने दर्दों और खाली चूल्हों की हकीकत सामने आई, तो पत्रकारिता के चौथे स्तंभ को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि आखिर हमारी व्यवस्था किस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। ‘ब्रांडवाणी समाचार’ के विशेष मंच ‘कलम की धार’ का यह स्पष्ट मानना है कि आज सत्ता अपने मूल संवैधानिक धर्म से भटककर केवल सत्ता-संरक्षण के एक संगठित उद्योग में तब्दील हो चुकी है।

विचारधारा का पतन, सादगी के उसूलों से भारतीय जनता पार्टी की दस सितारा महलों तक

एक दौर था जब भारतीय जनता पार्टी की पहचान पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ और अटल बिहारी वाजपेयी की लोकतांत्रिक शालीनता व सादगी से होती थी। अटल जी की राजनीति में प्रतिपक्ष का सम्मान था, सत्ता की हनक पर आत्मसंयम का अंकुश था और जनसेवा का एक नैतिक दायित्व था। परंतु आज की व्यवस्था को देखकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह वही दल है?

आज देश और प्रदेश के कोने-कोने में कॉर्पोरेट शैली के ‘दस सितारा’ स्तर के भव्य दफ्तर खड़े किए जा रहे हैं। चमचमाते कांच के शीशमहल, केंद्रीय वातानुकूलित विशाल सभागार और कॉर्पोरेट संस्कृति को मात देने वाली विलासिता। यह दृश्य उस देश में खड़ा किया जा रहा है जहां एक आदिवासी मां अपने बीमार बच्चे को अस्पताल ले जाने के लिए चारपाई पर ढोने को मजबूर है। जहां का किसान खाद की एक बोरी के लिए कड़कड़ाती ठंड में रातभर कतार में खड़ा रहता है। सत्ताधारी दलों का यह वैभव जनसेवा का प्रतीक नहीं, बल्कि जनता की गरीबी और लाचारी पर अट्टहास करता हुआ अहंकार है। यह स्पष्ट रेखांकित करता है कि राजनीति अब साधन नहीं, बल्कि अकूत पूंजी का ऐसा प्रदर्शन बन चुकी है जिसका जनता के बुनियादी संघर्षों से कोई सरोकार नहीं बचा।

सामाजिक विभाजन, ध्रुवीकरण की सुनियोजित प्रयोगशाला

आज की सत्ता प्रणाली का सबसे त्रासद पहलू यह है कि उसने समाज के स्वाभाविक ताने-बाने को अपनी चुनावी प्रयोगशाला बना दिया है। जब बुनियादी सवालों पर जवाबदेही तय करने का वक्त आता है—जब अस्पताल में डॉक्टर नहीं होते, स्कूलों में शिक्षक नहीं होते, मंडियों में फसल का दाम नहीं मिलता और युवाओं के हाथ खाली रह जाते हैं—तब सत्ता का तंत्र बहुत ही चालाकी से सामाजिक विभाजन का पर्दा गिरा देता है।

हिंदू बनाम मुस्लिम की विभाजनकारी बहसें हों, या फिर चुनावी गणित को साधने के लिए सामान्य, पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच अविश्वास की खाई को गहरा करना हो; सत्ता जानती है कि भावनाओं को कैसे भड़काना है। जमीन पर जाकर ऐसा कौन सा शब्द फेंकना है जिससे समाज बुनियादी मुद्दों को भूलकर आपस में ही उलझ जाए। जब तक जनता धर्म और जाति के नाम पर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी रहेगी, तब तक कोई भी नागरिक सत्ता से यह नहीं पूछेगा कि उसके गांव की सड़क क्यों नहीं बनी, पीने का स्वच्छ पानी क्यों नहीं आया और उसके बच्चे को रोजगार क्यों नहीं मिला। यह विभाजन सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का अपहरण है।

चुनावी रेवड़ियां बनाम स्थाई समृद्धि

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन-कल्याण और आत्मनिर्भरता के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है। आज की राजनीति ने जनता को स्वावलंबी नागरिक बनाने के बजाय उन्हें ‘उपभोक्ता’ और ‘वोट बैंक’ मान लिया है। जब चुनाव नजदीक आते हैं, तो जनता की बुनियादी बदहाली को दूर करने के ठोस रोडमैप की जगह नकद हस्तांतरण की घोषणाएं शुरू हो जाती हैं। सत्ता जानती है कि पंद्रह सौ रुपये से लेकर पांच हजार रुपये तक की चुनावी घोषणाएं करके कैसे आक्रोश को दबाया जा सकता है।

परंतु सवाल यह है कि क्या पंद्रह सौ या पांच हजार रुपये की यह तात्कालिक राहत उस युवा को भविष्य दे सकती है जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है और अंत में पेपर लीक की भेंट चढ़ जाता है? क्या यह राशि उस आदिवासी परिवार के जल, जंगल और जमीन के छीने जा रहे अधिकारों की भरपाई कर सकती है? असलियत यह है कि जनता के ही गाढ़े पसीने की कमाई से वसूले गए टैक्स का एक छोटा सा हिस्सा ‘रेवड़ी’ के रूप में वापस फेंक दिया जाता है, ताकि वह अपने गहरे घावों पर सवाल पूछना बंद कर दे और व्यवस्था से अपनी बुनियादी नागरिक गरिमा मांगना छोड़ दे।

नौकरशाही और सत्ता की साठगांठ, संगठित लूट का तंत्र

आज शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी सत्ता और नौकरशाही की वह साठगांठ है जिसने जनहित को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है। वल्लभ भवन के वातानुकूलित गलियारों से लेकर जिलों के कलेक्ट्रेट और जनपदों तक, भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं बल्कि एक व्यवस्थित नियम बन चुका है। जनता के कल्याण के लिए चलने वाली योजनाएं कागजों पर पूरी रफ्तार से दौड़ती हैं, लेकिन जमीन पर केवल धूल उड़ती है।

यह व्यवस्था अब नीतियों से नहीं, बल्कि अफसरों और नेताओं की व्यक्तिगत समझ और हिस्सेदारी से चलती है। सत्ता में बैठे नीति-नियंताओं को भली-भांति ज्ञात होता है कि कौन सा अधिकारी किस जिले में कितना धन एकत्र कर सकता है, कहां किस ठेके में कितना कमीशन निकाला जा सकता है और किस फाइल को दबाकर किसका हित साधा जा सकता है। जनता की शिकायतों की पोटली दफ्तरों में धूल फांकती रहती है, और रिश्वतखोरी के पैसे से नेताओं और अफसरों की तिजोरियां भरती जाती हैं। गांधी जी की तस्वीर वाले नोटों की पेटियां जब निजी संपत्ति, फार्म हाउसों और बेनामी जमीनों के सौदों में खपती हैं, तो उस वक्त केवल धन की बर्बादी नहीं होती, बल्कि उस गरीब की उम्मीदों का खून होता है जो न्याय की आस में कलेक्ट्रेट की सीढ़ियों पर दिनभर बैठा रहता है।

दोहरा मापदंड, पूंजीपति का उद्धार, मध्यम वर्ग पर भार और किसान की लाचारी

इस पूरी व्यवस्था का आर्थिक चरित्र पूरी तरह पूंजी-परस्त और जन-विरोधी हो चुका है। यहां न्याय के दो बिल्कुल अलग-अलग पैमाने हैं:

  1. बड़े पूंजीपति वर्ग के लिए खुली छूट, जो अरबपति हजारों करोड़ रुपये का बैंक लोन लेते हैं, वे व्यवस्था की जटिलताओं का लाभ उठाकर अपने कर्ज को ‘एनपीए’ (NPA) करवा लेते हैं और सत्ता की मेहरबानी से उनके कर्ज राइट-ऑफ या माफ कर दिए जाते हैं। वे सत्ता के करीबी बने रहते हैं और विदेशी दौरों की शोभा बढ़ाते हैं।
  2. मध्यम वर्ग का मौन दमन, देश का मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और छोटा व्यापारी हर चीज पर ईमानदारी से टैक्स भरता है इनकम टैक्स से लेकर आटा, दाल और बच्चों की पढ़ाई तक पर जीएसटी। लेकिन इस टैक्स के बदले उसे क्या मिलता है? खस्ताहाल सड़कें, महंगे निजी अस्पताल, निजी स्कूलों की मनमानी फीस और अंतहीन महंगाई। वह केवल व्यवस्था का बोझ ढोने वाला एक साधन बनकर रह गया है।
  3. छोटा व्यापारी और भूमिहीन मजदूर, स्थानीय किराना दुकानदार, फुटपाथ पर दुकान लगाने वाला और छोटा कारोबारी लगातार घाटे और विभागीय प्रताड़ना की गर्त में धकेला जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर, जब शहर के मास्टर प्लान बनते हैं या एक्सप्रेस-वे की योजनाएं खिंचती हैं, तो वल्लभ भवन से लेकर स्थानीय स्तर के नेताओं और अफसरों को पहले से पता होता है कि जमीन कहां से निकलेगी। वे औने-पौने दामों में किसानों से जमीनें हड़पते हैं और बाद में सरकारी नीतियों के दम पर जमीनों के भाव आसमान पर पहुंचाकर अरबों का मुनाफा अपनी जेबों में भरते हैं। किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन जाता है और बिचौलिए सत्ता के संरक्षण में रईस।

जागने का समय, जनता की अदालत ही अंतिम सच है

लोकतंत्र में जनता केवल पांच साल में एक बार उंगली पर स्याही लगाने वाला आंकड़ा नहीं है। जनता ही इस देश की वास्तविक मालिक है। जब तक समाज धर्म, जाति और झूठे भावुक नारों की अफीम के असर में रहेगा, तब तक यह संगठित तंत्र इसी तरह जनता का शोषण करता रहेगा।

बालाघाट के जंगलों से उठी आदिवासी समाज की वह आवाज केवल एक क्षेत्र का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतावनी है। यदि हम अपने बच्चों को ऐसा भविष्य देना चाहते हैं जहां शिक्षा का अधिकार हो, रोजगार की गारंटी हो, अस्पतालों में सम्मानजनक इलाज हो और भ्रष्टाचार-मुक्त समाज हो, तो हमें इन दस सितारा महलों में बैठे शासकों से सीधे और तीखे सवाल पूछने होंगे।

‘कलम की धार’ का यह स्पष्ट आह्वान है कि अब वक्त आ चुका है कि जनता जाति और धर्म के बंधनों को तोड़कर केवल एक पहचान के साथ खड़ी हो ‘नागरिक’ की पहचान। जब नागरिक सवाल पूछना शुरू करता है, तो बड़े से बड़े अहंकारी सिंहासन डगमगाने लगते हैं। अफसरों की मनमानी और नेताओं की झूठ की राजनीति तभी जमीन पर आएगी जब जनता अपनी खामोशी तोड़ेगी। लोकतंत्र की असली शक्ति किसी पार्टी के दफ्तर में नहीं, बल्कि जन-जागरूकता के संकल्प में निहित है।

  • Shruti Soni

    ब्रांडवाणी समाचार

    अनुभवी पत्रकार। हर दिन ताज़ा और सटीक खबरों के साथ आपकी सेवा में। निष्पक्ष रिपोर्टिंग और गहराई से तथ्य प्रस्तुत करना मेरी पहचान है।

    Related Posts

    अमित शाह ने उज्जैन के 255 करोड़ के डेयरी प्लांट का किया डिजिटल भूमिपूजन, गौशालाओं को 101 करोड़ से अधिक की मदद

    भोपाल, 3 अक्टूबर 2026: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री…

    आज शाह के साथ मोहन यादव का व्यस्त कार्यक्रम, न्याय संहिता प्रदर्शनी से IISER शिलान्यास तक

    भोपाल, 3 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    आज शाह के साथ मोहन यादव का व्यस्त कार्यक्रम, न्याय संहिता प्रदर्शनी से IISER शिलान्यास तक

    आज शाह के साथ मोहन यादव का व्यस्त कार्यक्रम, न्याय संहिता प्रदर्शनी से IISER शिलान्यास तक

    मुंबई के पायलट स्मित मच्छार की बहादुरी की चर्चा, 174 यात्रियों की जान बचाने के बाद उठी अशोक चक्र की मांग

    मुंबई के पायलट स्मित मच्छार की बहादुरी की चर्चा, 174 यात्रियों की जान बचाने के बाद उठी अशोक चक्र की मांग

    अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर: जानें इतिहास, महत्व और महात्मा गांधी से जुड़ा संबंध

    अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर: जानें इतिहास, महत्व और महात्मा गांधी से जुड़ा संबंध

    मोहन यादव से जुड़े जमीन सौदों पर रिपोर्ट, MP मीडिया की कवरेज पर उठे सवाल

    मोहन यादव से जुड़े जमीन सौदों पर रिपोर्ट, MP मीडिया की कवरेज पर उठे सवाल

    UNESCO की टेंटेटिव लिस्ट में MP की 4 धरोहरें, भारत की सूची में 78 स्थल

    UNESCO की टेंटेटिव लिस्ट में MP की 4 धरोहरें, भारत की सूची में 78 स्थल