
सार
भारतीय शेयर बाजार में 11 सितंबर को अचानक तेज गिरावट देखने को मिली। सेंसेक्स और निफ्टी करीब 1 फीसदी तक टूट गए, जबकि बीएसई का मार्केट कैप करीब 5 लाख करोड़ रुपये घट गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, अमेरिकी महंगाई और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार पर दबाव बढ़ाया।
विस्तार
शुक्रवार को कारोबार के दौरान भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली। सेंसेक्स करीब 637 अंक गिरकर 74,265.32 के स्तर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी करीब 230 अंक यानी 1 फीसदी टूटकर 23,255 के आसपास कारोबार करता दिखा। बाजार के लगभग सभी प्रमुख सूचकांकों पर दबाव रहा और मेटल सेक्टर में खास तौर पर बिकवाली तेज रही।
बीएसई के टॉप-30 शेयरों में भी गिरावट का असर साफ नजर आया। शुरुआती कारोबार में सिर्फ 8 शेयर मामूली बढ़त में थे, जबकि 22 शेयर लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। बजाज फाइनेंस, महिंद्रा एंड महिंद्रा और टाटा स्टील में 2 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। एलटी, एचडीएफसी बैंक और रिलायंस जैसे बड़े शेयर भी दबाव में रहे।
शेयर बाजार में आई इस गिरावट का सीधा असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा। बीएसई का कुल मार्केट कैप करीब 483 लाख करोड़ रुपये से घटकर 478 लाख करोड़ रुपये पर आ गया। यानी बाजार पूंजीकरण में करीब 5 लाख करोड़ रुपये की कमी आई।
बाजार में कमजोर धारणा का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 120 शेयरों में लोअर सर्किट लगा, जबकि 117 शेयर अपने 52 सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गए। कुल 3,365 शेयरों में से 2,376 शेयर गिरावट के साथ कारोबार कर रहे थे, जबकि 809 शेयरों में तेजी रही।
बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजहों में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत को माना जा रहा है। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महंगा कच्चा तेल महंगाई, चालू खाते और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ा सकता है।
वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया से जुड़ी बढ़ती भू-राजनीतिक चिंताओं ने भी तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है। इससे निवेशकों में आर्थिक दबाव और महंगाई बढ़ने की आशंका मजबूत हुई है।
अमेरिका में महंगाई से जुड़े मजबूत आंकड़ों के बाद वहां ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। बाजार में यह चिंता बनी हुई है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व को ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रखना पड़ सकता है। इससे उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी निकलने का जोखिम बढ़ता है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी का असर भी वैश्विक शेयर बाजारों पर पड़ा है। 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब 5 फीसदी के आसपास पहुंचने से निवेशकों के लिए जोखिम वाली संपत्तियों के मुकाबले बॉन्ड आकर्षक हो सकते हैं।
भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी दबाव की एक बड़ी वजह रही। 10 सितंबर को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में करीब 438 करोड़ रुपये की बिकवाली की। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब 1,026 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे, जिससे गिरावट को कुछ हद तक संभालने की कोशिश हुई।
बाजार की गिरावट का असर कई प्रमुख शेयरों पर पड़ा। हिंदुस्तान कॉपर और हिंदुस्तान जिंक करीब 4 फीसदी तक टूटे। लोधा डेवलपर्स में करीब 5 फीसदी की गिरावट रही। कोचीन शिपयार्ड और गोदरेज प्रॉपर्टीज करीब 6 फीसदी तक नीचे आए। डिक्सन टेक्नोलॉजीज और मुथूट फाइनेंस में भी तेज गिरावट देखने को मिली।
कुल मिलाकर महंगा कच्चा तेल, वैश्विक बाजारों में कमजोरी, अमेरिकी महंगाई और ब्याज दरों की चिंता तथा विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भारतीय बाजार का माहौल बिगाड़ दिया है। शुक्रवार की गिरावट ने एक बार फिर दिखाया कि वैश्विक घटनाक्रम का असर घरेलू शेयर बाजार और निवेशकों के पोर्टफोलियो पर तेजी से पड़ सकता है।
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